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राजा तो वैसा ही होगा जैसी प्रजा होगी. यह लोकतंत्र है. जो बात प्रजा को अच्छी लगती है वही राजा कहेगा, करेगा. मरकहे काटजू साहब बता ही चुके हैं. इसलिए ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता नहीं है. दस प्रतिशत के मन का तो कभी नहीं होगा. वह तो बस चिल्लायेंगे, वोट देने भी नहीं जायेंगे. बाक़ी, नब्बे प्रतिशत लोगों की सोच में जब बदलाव आयेगा तो राजा भी बदल जाएगा. यह मेल किसी मेल ने 1988 में भेजी थी, अभी डस्टबिन में मुझे मिली. हमने सोचा दस प्रतिशत के सामने रखूँ, शायद नब्बे प्रतिशत को कुछ समझा पायें ये लोग. # चुनाव_गदहचरि
बादल देखा, डर गया, रोने लगा रडार कक्का ने आराम से, बम को दिया उतार साईंस की ऎसी - तैसी बछवा खूँटा पर नहीं, गइया रही रम्भाय अम्मा आँगन मा खड़ीं, आँखिन आंस बहाय प्रदीप
देबू की किताबें ......................... अलमारी से निकल किताबें बाहर आती हैं देबू के ही साथ बैठकर खाना खाती हैं खाना ख़त्म हुआ तो पुस्तक हिस्ट्री की बोली देबू तुमको पता, आज मैं घंटे भर सो ली सोती हूँ मैं, जब तक मम्मी नहीं उठाती हैं चित्रकला की पुस्तक ने कुछ ऐसे रंग बिखेरे किरनें आकर बैठ गईं बिस्तर पर खूब सबेरे और बैठकर परियों वाली कथा सुनाती हैं देबू को सबसे प्यारी जो पुस्तक है विज्ञान की छुपी हुई है आज रूठ कर ओट लिए सामान की उसको लगता सभी किताबें उसे चिढ़ाती हैं -प्रदीप कुमार शुक्ल ( ' जुगलबंदी ' से )
देश चुनाव में है ----------------- चली गोलियां, पत्थर, डंडे सड़कों पर घूमे मुस्टंडे तब जा कर चुनाव निपटे हैं नेता जी के मुख से निकली भाषाओं के कान गरम हैं लक्ष्मी जी के पैर दबाती सरस्वती की आँखें नम हैं मर्यादा का चीर हरण है संस्कार सब लुटे पिटे हैं हो जाता रडार से बाहर कोई इतना फेंक रहा है कोई बस पूरे चुनाव में वही एक धुन रेंक रहा है कहीं धर्म की आग सुलगती कहीं अस्मिता की लपटें हैं दो कौड़ी कुर्सी की ख़ातिर लोग थूक कर चाट रहे हैं फ़ौज उल्लुओं की सड़कों पर गधे पँजीरी बांट रहे हैं गंगा मैया छोड़ - छाड़ कर लोग मुतहरा में रपटे हैं - प्रदीप कुमार शुक्ल
तीन साल पहले भी अम्मा गाँव में रहतीं थीं. फिर नोटबंदी हुई, फिर चुनाव हुए पर अम्मा अभी गाँव में ही हैं. याद आईं अम्मा / प्रदीप शुक्ल बरसों बाद अचानक फ़िर से याद आईं अम्मा बड़का लौटा रजधानी से मुस्काईं अम्मा पोता बहू साथ आए हैं लम्बी गाड़ी में अम्मा गोबर पाथ रहीं हैं मैली साड़ी में बहू पांव में झुकी ज़रा सा सकुचाईं अम्मा झोला लेकर बड़का सीधे कमरे के अन्दर समझ रहा भैया की तेजी अब मंझला चंदर छुप कर, चीनी दौड़ माँग कर हैं लाईं अम्मा चाय हो रही ठंडी बड़का नोटें गिनवाए अम्मा खाली चैक पर पर अपना नाम लिखे जाएं कहना चाहा बहुत पर न कुछ कह पाईं अम्मा. - प्रदीप शुक्ल
आग आपके घर में भी लग सकती है - 1 सूरत के विज़ुअल्स टीवी पर देखे नहीं जाते. मैंने हर बार बच्चों को बिल्डिंग से झुण्ड में कूदते देख आखें बंद कर लीं या टीवी का चैनल बदल दिया. लेकिन क्या आँखें बंद करने भर से बच्चे जीवित रहेंगे? नहीं. किसी दुर्घटना में वीडिओ बना रहे लोगों की भी जांच होनी चाहिए कि क्या वे पीड़ितों की मदद भी कर सकते थे या मदद करने की स्थिति में बिलकुल नहीं थे. अमूमन कहीं आग लगने पर भारत में फायर फाईटर्स के आने में आधे घंटे से एक घंटे का समय लग जाता है. उस समय वहा ँ उपस्थित मानव समूह आखिर क्या कर सकता है? इसका कोई समुचित दिशानिर्देश मुझे नेट पर भी नहीं मिला. लेकिन एक बात तो तय है कि हम वहाँ भीड़ लगाकर वीडिओ बनाते तो नहीं ही खड़े रह सकते, हाथ बांधे खड़े रहें तो भी चलेगा. ऊंची बिल्डिंग में आग लगने पर एक बात मुझे एकदम से सूझती है, वह है गद्दे इकट्ठे करने की. अगर रिहायशी इलाका है तो हर घर से एक गद्दा तो मिल ही सकता है. यदि मार्केट है तो आसपास कोई टेंट हाउस या उसका फोन नं मिल सकता है. यदि आप स्वयं किसी आग लगी बिल्डिंग में फँस जाएँ तो क्या करें, क्या न करें इस पर कुछ बातें अगल...
ललगुदिया अमरूद और गधे की लीद अभी पिछले हफ्ते गाँव गया था तो टहलते - टहलते वहाँ पहुँच गया जहां दरअसल मुझे जाना नहीं चाहिए था. सामने मेरे एक विशाल गड्ढा था. गड्ढे में मिटटी की ईंटे पाथी जा रही थीं और गधों द्वारा बगल के भट्ठे पर पहुंचाई जा रहीं थीं. मानो देश के गधे पसीना बहाते हुए देश के महान नेताओं की तिजोरी भर रहे हों. गड्ढे में ठीक उस जगह जहां पर गधे और आदमी की लीद गुत्थमगुत्था थीं, वहीं पर मेरे परम प्रिय ललगुदिहा अमरुद का पेड़ हुआ करता. अक्सर मेरा कोई दोस्त या भाई पेड़ पर  चढ़कर डंडे से अमरुद गिराता और मैं झपट लेता. मुझे लगा इसी लीद के नीचे मेरा अमरुद दब गया है. जैसे भ्रष्टाचार की लीद देश के ऊपर छोपी हुई है. लोग कहते हैं कि हमारे देश से आत्मा को गए कई दसक बीत चुके हैं बस लीद बची है. पर मेरा दिल तो लीद के नीचे अपने ललगुदिया को खोजने में लगा हुआ है, जो शायद कब का बिला चुका है. आज जहां पर इंसानों और गधों की लीद से विभूषित यह विशाल शाश्वत गड्ढा मौजूद है वहाँ पर कभी एक बहुत खूबसूरत बागीचा हुआ करता था. मेरे पितामह के पितामह के छोटे भ्राता ने कलकत्ता से मेहनत से कमाकर लाये हुए चांदी ...
बलिया जिले के बांसडीह गाँव में बलदेव सिंह का लड़का विप्लव सिंह उर्फ़ बिप्पू अगर हिंदी, अंग्रेजी के साथ तमिल पढ़े और तमिलनाडु के तुत्तुकुड़ी जिले के तिरुक्कुलूर गाँव के टी सुब्रमन्यम की बिटिया त्रिशा तमिल, अंग्रेजी के साथ हिंदी भी पढ़े तो अच्छा ही होगा. कल जब वह बंगलुरु के किसी ऑफिस में साथ - साथ काम करेंगे तो हँसते बोलते कन्नड़ भी सीख लेंगे. इसमें भला किसी को क्या परेशानी होनी चाहिए? # त्रिभाषा_का_टंटा
बबुआ बिलखैं बबुआ बिलखैं फूफू गुस्सा कनिया ते दिहिन उतारि दुसरे ट्वाला के लरिका का कनिया लइकै घूमीं तेलु लगाइनि, काजरु पारिन औ माथे मा चूमीं बबुआ के बप्पा संग बइठीं बुआ बहुतु मन मारि आंधी आई चला बवंडरु धुरिही धूरि उड़ानी दूनो घर कै छप्पर छानी भुईं मा परी उतानी ई ट्वाला ते उई ट्वाला तक द्याखै सकल जवारि कोउ न आवा उई ट्वाला ते बुआ बहुतु गुस्सानी सोचिनि आगे बरखा मा घरु होई पानी - पानी बबुआ ताकैं आंस भरे बुआ लिहिन हैं पल्ला झारि - प्रदीप कुमार शुक्ल
भाई बहनों राम - राम ईद पर सबको सलाम ------------------------ ईद आई - ईद आई मुस्कुराकर तुम ज़रा सा गले मिल लो आज भाई ईद आई - ईद आई नील नभ के हासिये पर चाँद आया इस धरा के कान में कुछ फुसफुसाया देखते ही बस ख़ुशी की लहर छाई ईद आई - ईद आई चमकता हामिद की टोपी का किनारा सादिया के पास है जगमग सितारा ओढ़नी के पार अम्मी मुस्कराई ईद आई - ईद आई काश! ऐसा हो कि हर दिन ईद हो हर जगह सुख चैन की बस नींद हो बंद हो इस जहाँ से ख़ूनी लड़ाई ईद आई - ईद आई. - प्रदीप कुमार शुक्ल
रोज़ बाउल में घमासान उर्फ़ साउथम्प्टन की लड़ाई -------------------------------------------------------- साउथम्प्टन मा बजा नगाड़ा भौकापुर तक परै सुनाय जीति कै कपु लै आव जवानौ चाय हियाँ पर रही सेराय लल्लू मिसिर कहि रहे तुमते भइया मानौ कहा हमार तेज गेंद बाजन का लीन्हेव काहे की परिहैं बौछार जीतेव टास तो पकरेव बल्ला भइया कोहली मानेव बात हवा चली गेंदु फिरि घूमी जइसे हुआँ बुढाई रात चौथे नंबर पर राहुल हैं कहि देव संभरि क खेलेव आज हियाँ तो राहुल मेटि दिहिन सब अब तुमरे हाथे मा लाज लुंगी कै लुंगी ढीली भै औ स्टेन का हाथु पिराय लइ दइ कै बसि बचे रबाडा उनका तुम लीन्हेव लुलुहाय गब्बर तुमते हवै गुजारिस रोहित है तुमते अरदास दस ओवरन तक खड़े रहेव तुम तुमका हम ब्वालब साबास ईद मुबारक तुम पंचन का सम्मी बिकेट गिरैहैं पाँच दउरति - दउरति अफरीका के निकरि न आवै देखेव काँच बाँधि लंगोटा फालिन होइ जाव लइ कै बजरंगबली क नाव टीबी पर चिपके हैं लल्लू म्वाछन पर दीन्हे हैं ताव - प्रदीप कुमार शुक्ल ( सेराय - ठंडी हो रही, मेटि दिहिन - मिटटी में मिला दिया, पिराय - दर्द, लुलुहाय - चिल्ला कर भगा देना, काँच - र...
पहलवान ककुआ ------------------- पहलवान सब भुरकुस होइगे खाय क गिरे पछाड़ा जीति लिहिन है ककुआ फिरि ते सबते बड़ा अखाड़ा राष्ट्रवाद का लइकै झंडा गलिन गलिन उई दउरे पूछैं सेना ते सवाल कुछु लोग हियाँ पर बउरे जोड़ घटाव नहीं कइ पाए उल्टा पढ़िनि पहाड़ा धरती सरकति देखिन दीदी हुआँ बहुतु फैट्यानी कांगरेस तौ पूरे द्यास म माँगि रही है पानी लेफ्ट क्यार पैजामा गिरिगा ढीला परिगा नाड़ा जाति के बंधना बाँधति रहिगे सब जातिन के आका अगर रवैया ना बदलिन तौ इनका परिहैं फांका मुला धरम का खूब जोर ते अबकी सेरु दहाड़ा काका अब तो जीति गयेव तुम यहि सेरवा का बांधौ अपने दल के सब सांड़न का जल्दी - जल्दी नाथौ नहीं तो ककुआ देर न लागी होई देसु कबाड़ा - प्रदीप कुमार शुक्ल ( भुरकुस - नन्हे टुकड़ों में टूटना, बउरे - मूर्ख, फैट्यानी - हंगामा किया, फांका - भूखे, सेरु - शेर, नाधौ - बैल,भैंसे आदि को वश में रखने के लिए उनकी नाक छेद कर उसमें रस्सी पिरोना )
बरवै - किरकिट ----------------- लंदन मा फिरि चमकी जब तरवारि लल्लू घर मा चिंता धरिनि उतारि कंगारू सब भागे भरिनि छलांग लल्लू ताकैं टीबी पीसति भांग गब्बर फेंकिसि बल्ला ताबड़ तोड़ कंगारुन का डारिसि मारि भंभोड़ जीते तबहीं जीति लिहिनि जब टास कंगारू फिरि लय ना पायिनि सांस धोनी मारिनि छक्का पाँव बढ़ाय कोली आँखी फारिन फिरि मुसक्यांय पंड्या लागति बनि जइहैं युवराज डुबिहैं सगरे दुसमन केर जहाज नाटिंघम मा कीवी बइठ तयार इनते भइया रहेव तनिकु हुसियार टिम साऊदी फेंकिहैं गेंदु घुमाय सीमा रेखा परि दीन्हेव पहुँचाय लल्लू बइठे बातैं रहे बनाय तुम वहु कीन्हेव तुमका जउन सुहाय एकु एकु बसि खेला जीतति जाव हम चाहिति है फिरि ते कपु लइ आव - प्रदीप कुमार शुक्ल
मुजफ्फरपुर का भोला ------------------------- जिद कर बैठा चाँद एक दिन अम्मा से फिर बोला कुछ तो पता करो मम्मा अब दिखे न अपना भोला अम्मा बोली पता किया वह रूठ गया है प्यारे और यहीं तारों में छुप कर बैठा कहीं किनारे उसकी अम्मा खोज रही है मुझको आये रोना मुझको घूर रहा है उसके घर का खाली कोना रूठ रूठ कर चले आ रहे कितने नन्हे तारे अभी जश्न में डूबे हैं पर राजा - मंत्री सारे ठंड बहुत है, भूखा भी है अम्मा अपना भोला तुम कह दो तो पहना दूँ मैं तेरा वही झिंगोला. - प्रदीप कुमार शुक्ल
जब से इंसान ने इस गोले पर होश सँभाला है, चिकित्सक किसी न किसी रूप में मौजूद रहा ही है, आगे भी रहेगा. चिकित्सक के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती. अब समाज की सोच ही तय करेगी कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य किन हाथों में होगा. लंबा जीवन जीने की लालसा बढ़ी है तो उसी अनुपात में रोगों की जटिलताएं भी बढ़ी हैं. आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को आत्मसात करने के लिए राह कठिन से कठिनतर और लम्बी होती जा रही है. चिकित्सक भी हमारी आपकी तरह इंसान है. उसे भी सम्मानपूर्वक और सुख सुविधाओं  से युक्त जीवन जीने का अधिकार है. ऐसे में समाज / मीडिया यदि चिकित्सकों के प्रति इसी तरह दुराग्रही बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम समाज के श्रेष्ट मस्तिष्कों को चिकित्सा विज्ञान से विमुख कर देंगे या उन्हें दूसरे देशों में जाने के लिए मजबूर कर देंगे. हाँ, सरकार चाहे तो आगे होने वाली योग्य चिकित्सकों की संभावित कमी को पूरा करने के लिए अंजना ओम कश्यप जैसी श्रेष्ठ, बुद्धिमान, संवेदनशील, जुझारू, मुखर, कर्मठ और देशभक्त ललनाओं ( और लालों ) को ब्रिज कोर्स करवा सकती है.
अब मान लो आपका कोई दोस्त कमरे में फटेहाल लेटा है. उसका मन रसगुल्ला खाने का है पर मुश्किल यह है कि उसकी जेब में पैसे नहीं हैं. परन्तु आपके पास भी इतने पैसे नहीं हैं कि स्विगी या ऊबर ईट्स से आप दोस्त के लिए रसगुल्ला भिजवा सको. तो आप उसे न्यूज़ पढ़कर सुना सकते हैं, सूचनाएं दे सकते हैं जैसे कि जर्मनी के किसी गाँव में एक सूअर दम्पति ने एक साल में छप्पन बच्चे जन्मे या मुजफ्फरपुर में एक सप्ताह में छप्पन बच्चे इस गोले से विदा हो गए और जिससे आक्रोशित गाँव वालों ने एक विधायक जी को  बंदी बना लिया. पैसे देकर विधायक जी छूट भी गए. विश्वास मानिए आपकी दी हुई उन सूचनाओं से जिनसे आपके दोस्त का कोई लेना देना भी नहीं है, ( वह तो बेचारा मुखर्जी नगर के एक कमरे में चार सालों से चारपाई पर लेटा पैसे ही कमा रहा है, यह उसे पता ही नहीं चला ) को बिलकुल उतना ही सुख प्राप्त होगा जितना उसे रसगुल्ला खाने या उसके पेटीएम वैलेट में पैसे आ जाने पर होता. बिलकुल ताजा शोध से पता चला है कि सूचना मष्तिष्क को बिलकुल वैसे ही पुरस्कृत करती है जैसे पैसा या बढ़िया खाना. कैलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, अमेरिका की प्रोफ़ेसर मिंग...
सिरिमान मैक पोम्पियो जी नमस्कार पोम्पियो जी तुम अमरीका ते चलि कै एत्ती दूरि आये हौ तहि बदे तुमका हम कुछु उलटा सीधा ना कहब. वइसेव मेहमान हमरे हियाँ भगवान् होति हैं. मुलु तुमतो हुआँ अपनी धरती पर कदम रखतै पैंट उतरवा लेति हौ. हमरे साहरुखौ का ना छोड़ेव तुम. खैर गुस्सा हम वहि बदे नहीं हन. गुस्सा हमार यहि खातिर है कि हमरे ककुआ के तुम, मतलब तुम्हार देसु, अमरीका बहुत दोस्त बनतु रहै औ उनहिन की पीठ मा छूरा भोंकि दिहेव. ठीक चुनावन के बीच उनकी तसबीर के साथ टाइम मा डिवाइडर इन चीफ बतायेव. औ इतनै नहीं वही टैम तुम अपने हियाँ ते व्योपार मा अड़ंगा लगाय दीन्हेव. अरे तनिकु चुनाव - फुनाव निपटि जातीं तौ सब कई लेतिव, हियाँ काका कउन मना करतीं. वहू का छोड़व, अब तुम हमरे ऊपर चढ़ेहे चले आ रहेव. बेमतलब मा अईठि रहेव. अच्छा खासा ईरान ते सस्ता मद्दा तेलु आवति रहै वहिका बंद करा दीन्हेव. ई अरबन रुपैया को हगी? चीन ते 5 जी न लेव नहीं तौ तुम्हार कान काटि ल्याब, रूस ते S - 400 न लेव नहीं तौ तुम्हारि पूँछ उमेठि द्याब, हमका पाकिस्तान समझे हौ का? ककुआ हमार फकीर आदमी हैं. डेराति बिलकुल नहीं. काल्हि मिलिहैं तुमरे आका ते....
इंतज़ार में सूखे नैन रातों दिन का छीना चैन नहीं सुहाए कोई बात क्या सखि साजन? ना ' बरसात ' सहमा - सहमा रहा लुकाय मुखिया होर बहुत पछुआय गारी दय - दय केहे अकच्छ बहिन मंसवा? नाहिं, ' बिपच्छ ' - प्रदीप कुमार शुक्ल उनका इंतजार, उई आवैं ओंठ छुएं, गरदन सोहरावैं काहे अब हमार जिउ जारैं सखी सजनवा? ना, ' बौछारैं ' - प्रदीप कुमार शुक्ल
डॉक्टर और समाज : डॉक्टर का पक्ष ----------------------------------------- ( पाठकों की सुविधा के लिए सारी कड़ियाँ एक साथ ) बहुत सारे फेसबुक मित्रों की शिकायत है कि एक डॉक्टर होने के नाते मैं हमेशा डॉ का ही पक्ष लेता हूँ. ऐसा नहीं है. लेकिन डॉ का पक्ष भी तो रखा जाना चाहिए. मीडिया में डॉक्टरों को लगातार गरियाने - लतियाने का जो मेरी प्रैक्टिस पर प्रभाव पडा है वहीं से शुरू करता हूँ. आज से बीस बरस पहले जब मैं नया - नया एमडी कर के आया था तो रात - रात भर जाग कर मरीज भरती करता था. हिन्दुस्तान के शीर्षस्थ मेडिकल कॉलेजों में एक से goldmedalist MD था. ध्येय सिर्फ पैसा कमाना नहीं था. बहुत सारे बहुत गंभीर मरीज जो गरीब थे उन्हें लेता और जी जान से लग जाता. बहुतों में सफलता मिलती कुछ मर भी जाते. यही सोच कर संतोष करता की दस में आठ तो बचा लिए. पूरे महीने का हिसाब करें तो मरने वाले भी काफी होते पर कभी डर नहीं लगा किसी बात का. मरीज के जीवित न रहने पर कभी पैसे के लिए दबाव नहीं बनाया. कुछ को तो जेब से भी पैसे दिए दवाएं खरीदने के, घर वापस जाने के. अब मेरे अस्पताल में बहुत कम मौतें होतीं हैं. चार छः...
कनखी दे कलियाँ हंसीं पुलकित, हुलसे पात लो फिर से आ ही गयी छम छम छम बरसात।
धक् धक् बोले मोरा जिया सारा बदन सुन्न कर दिया उससे हुईं जो आँखें चार क्या सखि साजन? ना सखि, ' हार ' बना बनावा मूड बिगारिसि बीच रास्ता ते लौटारिसि मुसकिल ते अब कटिहै रात का सखि साजन? ना, ' बरसात ' भले उसे जी भर गरियाऊँ मगर उसी पर प्यार लुटाऊँ आज उसी की चर्चा होनी क्या सखि साजन? ना सखि ' धोनी ' उसको अब आना ही होगा कोई नहीं बहाना होगा उसके लिए किये सब जप तप क्या सखि साजन? नहीं, ' विश्वकप ' खूब झमाझम बरसा पानी पर उसकी अपनी मनमानी उसके बिना रात यह निकली क्या सखि साजन?न सखि, ' बिजली '