डॉक्टर और समाज : डॉक्टर का पक्ष
-----------------------------------------
-----------------------------------------
( पाठकों की सुविधा के लिए सारी कड़ियाँ एक साथ )
बहुत सारे फेसबुक मित्रों की शिकायत है कि एक डॉक्टर होने के नाते मैं हमेशा डॉ का ही पक्ष लेता हूँ. ऐसा नहीं है. लेकिन डॉ का पक्ष भी तो रखा जाना चाहिए.
मीडिया में डॉक्टरों को लगातार गरियाने - लतियाने का जो मेरी प्रैक्टिस पर प्रभाव पडा है वहीं से शुरू करता हूँ.
आज से बीस बरस पहले जब मैं नया - नया एमडी कर के आया था तो रात - रात भर जाग कर मरीज भरती करता था. हिन्दुस्तान के शीर्षस्थ मेडिकल कॉलेजों में एक से goldmedalist MD था. ध्येय सिर्फ पैसा कमाना नहीं था. बहुत सारे बहुत गंभीर मरीज जो गरीब थे उन्हें लेता और जी जान से लग जाता. बहुतों में सफलता मिलती कुछ मर भी जाते. यही सोच कर संतोष करता की दस में आठ तो बचा लिए. पूरे महीने का हिसाब करें तो मरने वाले भी काफी होते पर कभी डर नहीं लगा किसी बात का. मरीज के जीवित न रहने पर कभी पैसे के लिए दबाव नहीं बनाया. कुछ को तो जेब से भी पैसे दिए दवाएं खरीदने के, घर वापस जाने के.
अब मेरे अस्पताल में बहुत कम मौतें होतीं हैं. चार छः महीनों में एक आध.अब मैं ज्यादा काबिल नहीं हो गया हूँ. पर डर गया हूँ. अपने सामने गंभीर मरीजों को वापस भेजते देखता रहता हूँ. अन्दर से कभी - कभी यह भी मन करता है कि ये मुझे एक भी पैसा न दे पर मैं कोशिश करना चाहता हूँ. हिम्मत ही नहीं जुटा पाता कि अगर नहीं बचा पाए तो इस उम्र ( पचास पार कर गया हूँ ) में कौन गालियाँ खाए या कोई छुरा ही भोंक दे.बिना एक पैसा लिए भी मरीज की मौत पर खूब गालियाँ सुन चुका हूँ.
अभी का ताजा - ताजा एक किस्सा सुनिए.
परसों की बात है, शाम की OPD में ठीक ठाक खाते पीते घर की दो महिलायें एक दस - बारह साल की बच्ची को लेकर आये. बच्ची अपने कष्ट में विचलित जान पड़ी. मैंने उन महिलाओं में जो मां लग रही थी बच्ची की, बात शुरू की.
कुछ नहीं डॉ साहब बच्चे आजकल के मानते नहीं हैं. परसों हम इनकी जिद से वाटर पार्क गए. लौटते ही इनको बुखार आ गया. बुखार की दवा दी तो उल्टियां होने लगीं. मैंने सोचा आपको दिखा दूं कहीं और तबियत न खराब हो जाय.
मेडिकल कॉलेज में हम जब हम मरीज देख रहे होते हैं तब हमको किताबी ज्ञान बहुत होता है पर मरीज पहचानने में कभी - कभी मात खा जाते हैं. दरअसल किताबें पढ़कर हम बीमारी और बीमार की जेहन में एक फोटो बना लेते हैं. फिर उस फोटो का मिलान सामने वाले मरीज से करते हैं. अब बीमारी तो किताब पढ़कर आती नहीं डॉक्टर के पास. इंसान की तरह बीमारी भी अपना रूप बदलती रहती है. शुरुआती लक्षण कुछ और, जवान हो चुकी बीमारी बिलकुल अलग दिखती है. मेडिकल कॉलेज में रेज़ीडेंट डॉक्टर सामान्यतः बीमारी से तब लड़ रहे होते हैं जब वह अपने विकराल रूप में होती है. बाहर निकल कर अक्सर बीमारी शैशवावस्था में मिलती है. जिससे उसे पहचानने में मुश्किल होती है
लो मैं कहानी से भटक गया. फिर टूटा हुआ सिरा पकड़ता हूँ.
बाहर आने पर धीरे - धीरे हम डॉक्टरों का किताबी ज्ञान कम होने लगता है लेकिन मरीज पहचानने में गलतियाँ भी कम होने लगती हैं.
वह बच्ची एक जगह बैठ नहीं पा रही थी. आँखे पूरी नहीं खोल रही थी, सर में दर्द था और सबसे बड़ी बात कि वह काफी बीमार दिख रही थी. उसको काउच पर लिटा कर एग्जामिनेशन करने के बाद यह आभास हुआ कि उसको दिमाग में किसी प्रकार का संक्रमण हो सकता है.
मैंने बात शरू की. देखिये, आपके बच्चे को अभी भरती करना पड़ेगा, दवा लिखकर मैं इसे घर नहीं भेज सकता.
भर्ती !! भर्ती क्यों. अरे उसे थोड़ा बुखार ही तो है. वाटरपार्क जाने से हो गया है. आप कुछ दवा दे दीजिये, मैं भर्ती नहीं कराऊंगी. दो चार उलटी ही तो हुई हैं. बिलकुल ठीक है यह, पता नहीं क्यों आप भर्ती करना चाहते हैं?
मैंने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन वह हमारी बात तब तक सुनने को तैयार नहीं हुई जब तक मैंने यह साफ़ नहीं कर दिया कि मैं इसे अपने अस्पताल में भर्ती नहीं कर रहा हूँ. और आपने जो फीस जमा की है उसे भी वापस करा दे रहा हूँ.
भर्ती करना है तो आप ही भर्ती कीजिए ना, आपका इतना नाम सुनकर तो यहाँ आये हैं. कहीं और भरती कराना होता तो यहाँ क्यों आते? अब माताजी के स्वर कुछ बदलने लगे. मैंने समझाया कि मेरे पास बड़े बच्चों के लिए आईसीयू की सुविधा नहीं है और आपके बच्चे को सीरियस इन्फेक्शन होने की संभावना लग रही है. तो आप उस अस्पताल में भर्ती कराइए जहां आईसीयू का बैकअप भी हो. आपके तो पैसे लगने ही हैं चाहे यहाँ करवाइए या वहाँ. रात में दो बजे यदि मैं आपसे कहूं कि इसे आईसीयू की जरूरत है अब आप ले जाइए तो यह मुझे ठीक नहीं लगता. बच्चे को भी ख़तरा बढ़ जाएगा.
तो क्या आईसीयू में भर्ती कराना है?
नहीं, अभी नहीं पर अस्पताल में जरूरत पड़ने पर उपलब्ध हो. देखिये अभी आप लखनऊ जैसे शहर में हैं जहां बहुत अस्पतालों में यह सुविधा उपलब्ध भी है. आपके पैसे खर्च होने ही हैं तो वहीं कराइए. अभी आप गाँव या किसी छोटे शहर में होती तो बात अलग थी.
नहीं, अभी नहीं पर अस्पताल में जरूरत पड़ने पर उपलब्ध हो. देखिये अभी आप लखनऊ जैसे शहर में हैं जहां बहुत अस्पतालों में यह सुविधा उपलब्ध भी है. आपके पैसे खर्च होने ही हैं तो वहीं कराइए. अभी आप गाँव या किसी छोटे शहर में होती तो बात अलग थी.
अब आप ही बताइये, कहाँ ले जाऊं? माताजी ने हथियार डाल दिए थे.
आपके घर के पास 'क' और 'ख' दो अस्पताल हैं आप दोनों में जिसमे चाहें भर्ती हो जाइए.
आपके घर के पास 'क' और 'ख' दो अस्पताल हैं आप दोनों में जिसमे चाहें भर्ती हो जाइए.
'क' नहीं, वह बहुत लूटता है. और 'ख' तो बिलकुल नहीं वहाँ मेरी एक रिश्तेदार मर गयी थीं.
रात के नौ बजने वाले थे. मैं माताजी को बच्ची के बेहतर इलाज के लिए भर्ती की आवश्यकता समझाने में सफल हो गया था. समस्या अब अस्पताल की रह गयी थी. बगल में सौ बिस्तरों और पांच बालरोग विशेषग्य डॉक्टरों से सुसज्जित सरकारी अस्पताल में वह जाना नहीं चाहती थीं. मेडिकल कॉलेज का उनका अनुभव बहुत खराब था. पैसा उनके पास था पर इतना नहीं कि पास में खुले नए कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में भर्ती करा सकें.
फोन पर उन्होंने कई लोगों से बात की फिर अस्पताल 'ग' के लिए मन बनाया. सौभाग्य या दुर्भाग्यवश वहाँ के बालरोग विशेषग्य मेरे बहुत अच्छे दोस्त और प्रिय जूनियर हैं. वह उस अस्पताल से राउंड लेकर बस निकलने ही वाले थे. मैंने उन्हें वहीं रुकने के लिए कहा, बच्ची की स्थिति और संभावित डायग्नोसिस के बारे में बात की, उनके OPD फीस के पैसे लौटाए. इस सलाह के साथ कि सीधे अस्पताल जाएँ और डॉ से मिलें. मैंने अपने जूनियर से अनुरोध किया कि वह अपने सामने ही पहला एंटीबायोटिक शॉट लगवा दें, बाक़ी जांचें बाद में होती रहेंगी.
जब कभी हम डॉ लोग किसी गंभीर संक्रमण के बारे में सोचते हैं खासकर दिमागी बुखार ( जीवाणु जनित ) के बारे में तो अन्दर एक उलझन शुरू हो जाती है कि इसको जल्दी से जल्दी एक डोज़ एंटीबायोटिक की तुरंत मिल जाए. कभी कभी कुछ घंटों की देरी भी जानलेवा साबित हो सकती है। ऐसे में बार - बार जल्दी करने पर मरीज के रिश्तेदार को शक पैदा होने लगता है कि आखिर डॉ को इतनी जल्दी क्यों मची है? जरूर अस्पताल से इसकी सांठ - गाँठ है. यह जो मुझको इतना समय दे रहा है डॉ, और फीस भी वापस कर दे रहा है, यह मुझे फंसाने की चाल है. यह सोच रहा है कि मरीज कहीं और न चला जाय।
यह तो अच्छा हुआ कि अस्पताल 'ग' के चयन में मेरी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी. अस्पताल 'ग' जिसमे वह जाने को तैयार थीं वह बिलकुल मेरे बगल में ही स्थित है. यदि वह कहीं दूर जा रही होती तो पहला शॉट मैं खुद लगाकर भेजता. हालांकि अब यह करना मैंने बहुत कम कर दिया है.
इस तरह बहुत बार मैं हवन करते हुए अपने हाथ जला चुका हूँ. एक छोटा सा किस्सा याद आ रहा है. बात बेकार में बढ़ती जा रही है पर यह क्षेपक पूरा किये बगैर किस्से को आगे बढ़ाना अब असंभव लग रहा है.
एक बहुत छोटा सा बच्चा, डेढ़ महीने का, मेरे पास गंभीर हालत में लाया गया.
बच्चा वाकई में बहुत गंभीर था. पचास किलोमीटर दूर एक गाँव से आया था. मेडिकल कॉलेज जाने को तैयार नहीं था. मैंने समझाया कि जो थोड़े बहुत पैसे आपके पास हों वह जमा करें. कंसेंट लिखें, बचने की उम्मीद बहुत कम है फिर भी हम कोशिश करेंगे. थोड़ी देर वे आपस में बात करते रहे फिर बोले डॉ साहेब कुछ दवा लिख दीजिये हम भर्ती नहीं करायेंगे वहाँ घर में एक छोटा बच्चा और है, फसल भी खड़ी है खेतों में.
मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की. कहा कि तुम केवल दवा खरीद लेना और आईसीयू का कोई चार्ज नहीं लगेगा. यहाँ किसी को रुकने की भी जरूरत नहीं है. ऐसे में मरीज फिर शंकित हो जाता है. हो न हो डॉ फंसा रहा है. सब दवाई के नाम पर कमा लेगा. मैं मानता हूँ कि इस अविश्वास की बड़ी वजह हमारी अपनी डॉ कम्युनिटी है. बेचारा मरीज दूध का जला हुआ मट्ठा भी फूंक - फूंक कर पीता है.
खैर, वह फ्री में भी अब रुकने को तैयार न था. मैंने आखिरी कोशिश के तहत उसे वीगो डाला और दो इंजेक्शन खुद अपने हाथ से नस में लगा दिए इस हिदायत के साथ कि बाक़ी के इंजेक्शन गाँव के बगल वाले सरकारी अस्पताल में लगवा ले. और हो सके तो कुछ दिन वहीं भर्ती करा ले. जीवित रहे तो मुझे फिर दिखा लें.
करीब दो घंटे हुए होंगे उस मरीज को गए हुए कि अचानक दस बारह लोगों की भीड़ धड़ाधड़ चैंबर में घुस आई. कौन सा इंजेक्शन लगा दिया मेरे बच्चे को? जब हम लाये थे तो बिलकुल ठीक था, दूध भी पिया था. आप ने क्या लगा दिया हमारे बच्चे को. गलत इंजेक्शन लगा कर मार डाला.
काफी देर तक हंगामा होता रहा. डस्टबिन से निकालकर इंजेक्शन दिखाया, एक्सपायरी डेट भी सबने लेंस लगाकर पढी. खैर किसी तरह मामला सुलटा.
एक क्षेपक और. मुख्य किस्सा फिर आगे बकईयाँ - बकईयाँ चलेगा.
एक नवजात शिशु हमारे अस्पताल में पीलिया के लिए भर्ती हुआ.
नवजात शिशुओं में पीलिया बड़ों में होने वाली पीलिया से बिलकुल अलग होती है. लैब की रिपोर्ट में लिखी संख्याओं को देखकर अक्सर लोग घबरा जाते हैं. ज्यादातर मामलों में पीलिया यानी jaundice नार्मल होती है. पर हमेशा यह सत्य नहीं है. ज्यादा पीलिया नवजात शिशुओं के अपरिपक्व रक्षा प्रणाली को वेधते हुए दिमाग को पीले रंग से रँग देती है और बच्चे को जीवन भर के लिए अपंग कर सकती है या उसका जीवन ही समाप्त हो सकता है.
बच्चे का जन्म के समय वजन, समय से पहले या समय से पैदा हुआ बच्चा, उसका और उसकी माँ का ब्लड ग्रुप, आयु ( घंटों में ) खून में पीलिया की मात्रा आदि गणनाएं यह तय करती हैं कि बच्चे को किस तरह के इलाज की आवश्यकता है, या इलाज की आवश्यकता है भी कि नहीं. ज्यादातर मामलों में प्रकाश के नीचे रखने से बिलीरुबिन कम हानिकारक तत्व के रूप में बदल कर शरीर से बाहर चला जाता है. पीलिया लगातार बढ़ने या किसी विशेष परिस्थिति में बच्चे का खून भी बदलना पड़ता है, पर वह बहुत कम प्रतिशत बच्चों में होता है.
इस बच्चे को पीलिया के इलाज की आवश्यकता थी और साधारण इलाज से तीन दिन में अपने घर चला गया. दरअसल पीलिया एक लक्षण भर है इसके कारण बहुत सारे हो सकते हैं. नवजात शिशुओं में लम्बे समय तक बिलीरुबिन लेवल ज्यादा रहने के कई कारणों में से एक कारण होता है थाइरोइड हारमोंस की कमी.
थाइरोइड हारमोंस हमारे शारीरिक विकास में सहायक होते हैं, खासकर मष्तिष्क विकास में. काफी बच्चों में जन्मजात थाइरोइड हारमोंस की कमी होती है. ऐसे बच्चों में शारीरिक विकास के साथ - साथ मानसिक विकास भी बाधित होता है. वैसे तो सारे नवजात शिशुओं की थाइरोइड की जांच करवानी चाहिए, यूनिवर्सली. परंतु धनाभाव या लोजिस्टिक्स के चलते अगर यह संभव न हो पाए तो जिन बच्चों में इसके लक्षण दिखाई पड़ते हैं उनमे इसकी जांच डॉ अवश्य कराते हैं. पैदाइशी थाइरोइड हारमोंस की कमी के कई लक्ष्ण होते हैं उन्ही में एक है पीलिया.
तो हमारे इस बच्चे को जांच में थाइरोइड हारमोंस की कमी आई. जांच की रिपोर्ट उसके जाने के बाद मिली. स्क्रीनिंग रिपोर्ट को कन्फर्म करने के लिए उसे दुबारा बुलाया गया पर वह नहीं आया. मेरे दिमाग में उसकी रिपोर्ट कुण्डली मारकर बैठ गयी.
दरअसल इसका इलाज बीमारी पता लगते ही शुरू नहीं करने पर बच्चे के मानसिक विकास पर इसका असर होने लगता है. कुछ दिनों की देरी भी बच्चे को मंदबुद्धि बना सकती है.
मैंने फिर फोन करवाया. उसने हाँ - हाँ ठीक है कह कर टाल दिया. इधर हमारी बेचैनी बढ़ती जा रही थी और उसने हमारा फोन उठाना बंद कर दिया.
फिर करीब एक महीने के बाद वह आदमी बच्चे के साथ प्रकट हुआ. उसने बताया कि जब आपका फोन बार - बार आ रहा था तो मुझे लगा कि आप लोग मुझे जबरदस्ती जांच वांच में फंसा रहे हैं. मुझे बच्चा बिलकुल ठीक लग रहा था. फिर कुछ दिनों बाद वे बच्चे को लेकर एक दूसरे डॉ के पास गए उसने उन्हें पीजीआई भेज दिया. वहाँ पर उन्हें पता चला कि इस बीमारी का इलाज समय रहते क्यों जरूरी था. और हम लोग उन्हें बार - बार फोन क्यों कर रहे थे.
आज वह हमारे नियमित मरीज हैं और मेरी हर बात पर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं.
मूल कहानी रह ही गई.
जो किस्सा हमने शुरू किया था वह क्षेपकों और अंतर्कथाओं के कारण कहीं बिला गया है. आइये सूत्र फिर पकड़ते हैं.
दस साल की बच्ची मेरे पास आई जिसे मुझको दिमागी बुखार की संभावना जान पड़ी. माताजी ने 'ग' अस्पताल का चुनाव किया. हमारे दोस्त डॉ ने हमारे कहने पर उनका इलाज अपने सामने शुरू करा दिया.
खून की जांच के लिए सैम्पल भिजवा दिए गए. दवायें चलने से सुबह तक बच्ची को थोड़ी राहत भी मिल गयी. मैंने सुबह डॉ को फोन कर मरीज के हाल चाल लिए और यह हिदायत भी दी कि दिमागी बुखार की संभावना लग रही है और पुष्टि करने के लिए लम्बर पंक्चर जरूर करें. जिसके लिए मरीज के रिश्तेदार टालामटोली कर रहे थे.
मष्तिष्क को सुरक्षित रखने के लिए उसके चारों तरफ कई झिल्लियों का आवरण होता है. जीवाणुजनित दिमागी बुखार में दरअसल इन्ही झिल्लियों में संक्रमण होता है. संक्रमण जांचने के लिए रीढ़ की हड्डी में पतली सुई डालकर थोड़ा द्रव निकालकर उसकी विधिवत जांच करते हैं. इसमें कोई ज्यादा तकलीफ नहीं होती है. ख़तरा भी नगण्य. पर यह जांच बहुत आवश्यक होती है. क्योंकि सामान्य संक्रमण के बरक्स दिमागी बुखार में दवाएं दोगुनी मात्रा में और लम्बे समय तक चलाई जाती हैं.
मरीज के रिश्तेदार छुट्टी कराने पर उतारू थे. डॉ उनको लगातार खतरे समझा रहा था पर उनका बच्चा उन्हें बेहतर लग रहा था.
अचानक फिर से उसे तेज बुखार और उल्टियां शुरू हो गयीं. अब तो खैर उन्हें रुकना ही था. लम्बर पंक्चर शाम को हो पाया और फोन पर रिपोर्ट पता करने पर यह पाया गया कि बच्ची को दिमागी बुखार है. इस तरह के संक्रमण में सबसे जरूरी होता है समय पर डायग्नोसिस और तुरंत इलाज का शुरू होना. यह दोनों काम विधिवत संपन्न हुए थे. थोड़ी सी भी देर या लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है.
हम दोनों डॉ अपने क्लीनिकल अक्यूमेन और मरीज के प्रति अपने कर्तव्य निर्वहन करने के चलते मन ही मन प्रसन्न थे.
अचानक रात में बारह बजे मेरे दोस्त डॉ के पास मोबाइल पर फोन आया. उधर से कोई सज्जन बोल रहे -
सुन डॉ कौन सी जांच कराई बे? ..... वह जाँच कहाँ है? .....जानता हूँ मैं तुम डॉक्टरों को चूतिया बनाते हो साले सब आपस में मिलकर. पैसे कमाने का धंधा बना रखा है सालों .....तुमको मैं देख लूंगा साले मा@#$%, भों@##$ वाले घर से निकाल कर मारूंगा. अभी आओ साले यहाँ अस्पताल में ..........
समाप्त
- प्रदीप कुमार शुक्ल
Comments
Post a Comment