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  ! झूठा सच !! झूठ सच से जुदा कर न पाया कभी , मैं क्या बोलूँ बस तौलता रह गया ! कल जो मेरे लिए झूठ था आज सच , जब भी मौक़ा मिला झूठ सच हो गया ! सच मैं कैसे कहूं मुझमे हिम्मत नहीं , रात भर मैं यही सोचता रह गया ! बात झूठी जमाने को सच्ची लगे , बस यही सोच कर हर सितम सह गया ! झूठ सच के जनाज़े में लिपटा हुआ , आखिरी वक्त में झूठ सच सब गया ! झूठ मैं बोलता रहा उम्र भर , आज अनजान में ही मैं सच कह गया !! - डॉ . प्रदीप शुक्ल 23.11.2013
  ! तेज़ पुराण !! तहलका में खूब तहलका मचा है खेल हुआ ख़त्म अब क्या बचा है !! तेजपाल निश्तेज हो गए , बुरे हैं अब हालात लिफ्ट नहीं सीढ़ी से अब तो जायेंगे हवालात !! उनके क्रिया कलापों पर है , अब गंभीर सवाल हफ्ते भर से मीडिया में , छाया यही बवाल !! बेटी की उम्र की महिला से , उत्पीड़न का आरोप कई तरह की धाराएं , दी गयी हैं थोप !! तेजपाल के अनुसार ये है विरोधियों का वार मैं तो दूध का धुला हूँ हाँ तबियत का थोड़ा खुला हूँ दारू पीकर थोड़ा मज़ाक कर रहा था बस इधर उधर थोड़ा तांक झाँक कर रहा था आखिर मैं उसका बॉस हूँ ऊपर से मैं कुछ ख़ास हूँ मैंने मीडिया जगत में तहलका मचाया है सबको खुफिया कैमरे का इस्तेमाल सिखाया है उसी कैमरे की वजह से आज मैं परेशान हूँ आगे क्या होगा यही सोच कर हैरान हूँ ये हमारे खिलाफ एक राजनैतिक साजिश है सबको हमारी चोटी खींचने की ख्वाहिश है ............................................. ............................... समय की कमी के कारण पुराण का प्रथम अध्याय यहीं समाप्त होता है ... अगले अध्याय सहित फिर हाज़िर होंगे बोलो किशन कन्हैया की जय !! 37 You, Sandeep Shukla, DrSaurabh Bajpai...
  " तेज पुराण " दूसरा अध्याय .............. वो चेहरा बाप का लगता था मुझको हर समय लेकिन न जाने किस तरह की गंध थी उसके पसीने की !! वो जब भी देख लेता था मुझे कोने अकेले में करे कोशिश हमेशा बस मुझे आँखों से पीने की !! ज़ेहन में थी बनी तस्वीर उसकी एक मसीहा की मगर अब देखती हूँ तो लगे सूरत क.... की !! तेरी बेटी के संग मैं खेलती थी तेरी गोदी में तू तब भी तीस का था , मैं जब थी कुछ महीने की !! वो कहता है कि इसमें थी मेरी सारी रजामंदी बेगैरत , तू नहीं रखता है ख्वाहिश और जीने की !! - डॉ . प्रदीप शुक्ल 07.12.2013
  ! निर्भया की याद में !! जाने कितने सपने लेकर शहर आई थी बाबू जी ! मेरे सारे अरमानों को मौत खा गई बाबू जी !! सोचा था पढ़ कर समाज में मैं भी कुछ बन जाऊंगी तेरे शहर की गलियों में बदनाम हो गयी बाबू जी !! मेरा कुसूर बस इतना सा मैं एक अबला नारी थी पिंजरे में थी एक चिरैया कई शिकारी बाबू जी !! तुम सब भी उतने ही दोषी जितने वो सब गुंडे थे मेरी बलि के बाद ही सही अब तो सीखो बाबू जी !! कब तक आँखें बंद रखोगे आस पास की दुनिया से छुपे हुए बदकारों को बस खोज निकालो बाबू जी !! मैं नारी हूँ मुझसे तुम बस नारी सा ब्यवहार करो मत पूजो तुम मुझको ना पत्थर मारो बाबू जी !! मुझको तो इस दुनिया में बस इतना ही जीना था मेरे जैसी औरों की तो जान बचा लो बाबू जी !! - डॉ . प्रदीप शुक्ल 16.12.2013
  !! घर !! तिनका तिनका जोड़ बनाया , बरसों का अरमान था घर दादा जी के क़दमों की , आहट का पहचान था घर !! दादी ने पूरे जीवन भर , बस घर का सपना देखा बाबू जी की श्रम बूंदों का , मेरी माँ का जान था घर मेरा पहला शब्द कैद है , उस घर की दीवारों में मेरे सब सपनों का साक्षी , वो मेरे अपनों का घर मिट्टी , गारा , लोहे से तो , दीवारें , छत बनती हैं हंसी , ठहाका , आंसू , गुस्सा , साँसों से बनता है घर दूर चला आया मैं उससे , वो बस मेरी यादों में पूरे जीवन साथ रहेगा , वो मेरे बचपन का घर सुबह से लेकर शाम हो गई , सड़कों पर तू दौड़ रहा पंछी वापस लौट चले हैं , तुझे पुकारे तेरा घर !! - डॉ . प्रदीप शुक्ल 23.12.2013
CAA के खिलाफ़ आंदोलन दरअसल NRC के लिए एंटीसीपेटरी बेल के माफ़िक है। मुझे यह ठीक भी लगता है। परंतु तभी तक जब तक यह अहिंसात्मक रहे और हिंदुओं के खिलाफ़ न हो। इसका असर भी तभी होगा। हालांकि कुछ असर अभी से दिखना शुरू भी हो गया है। संसद में रौद्र रूप धारण किए ग्रुहमंत्री के बयान " 2024 से पहले पूरे देश मे एनआरसी हम लागू कर के रहेंगे ( ऊर्ध्वाधर तर्जिनी के भार सहित ) " के बाद एनआरसी का भ्रम दूर करने के लिए आज के समाचारपत्रों में विज्ञापन की भाषा आप देखेंगे तो आपको फ़र्क साफ़ नज़र आय ेगा। कुछ लोगों का मानना है कि एंटीसीपेटरी बेल की आवश्यकता नहीं है जब एफआईआर होगी तब न मुकदमा लड़िएगा? अभी बेकार मे लत्ते का साँप बना रहे हैं। कुछ कहते हैं, जब आग लगेगी तब कुआं खोदने से क्या लाभ होगा? सयाने लोग समझा रहे हैं, देखिये इस CAA में किसी, मतलब किसी भारतवासी के लिए कोई परेशानी नहीं है, मल्लब बिलकुल्लै नहीं। अब जब एनआरसी के कायदे कानून सामने आएंगे तब न उसकी मेरिट-डिमेरिट पर बातचीत करिएगा। बकिया, गांधी के देश मे हिंसा की कोई जगह बनती नहीं है। यह बात याद रखनी जरूरी है, समय की मांग भी यही है। #...
# गांधीजी_कहिन 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान मुंबई ( तब बॉम्बे ) में जब सड़कों पर पारसियों और क्रिश्चियनों को आंदोलनकारी हिंदुओं-मुस्लिमों द्वारा मारा-पीटा गया तब गांधीजी छुब्ध होकर ' यंग इंडिया ' में लिखते हैं - " यदि हम अल्पसंख्यक पारसियों और क्रिश्चियनों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे तो क्या गारंटी है कि जब सत्ता बहुसंख्यक हिंदुओं के हाथ में होगी तब अल्पसंख्यक मुसलमानों या बहुसंख्यक कमजोर हिंदुओं को प्रताड़ित नहीं किया जाएगा। "
आज संविधान दिवस पर सवाल यह है कि जब जनता ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था तो महामहिम ने अजित दादा को सत्ता पर कब्जा क्यों दिया? श्रीमान फणनवीस जी ने हर रैली मे ' दादा को जेल भिजवाईंग और चक्की पिसाईंग ' का भाषण पिला कर वोट मांगा। जनता ने उनको और उद्धव को सीटें इसीलिए दीं कि हजारों करोड़ के सिंचाई घोटालों मे कथित तौर पर संलिप्त अजित दादा को जेल भेजा जाये। बहुत लोगों ने इसलिए भी भाजपा-शिवसेना को वोट किया कि हमारे युगपुरुष मोदी जी के ' न खाऊँगा न  खाने दूंगा ' वाले जुमले पर उनको विश्वास था। सत्ता के लिए लार टपकाते दूसरे धड़े का भी यही हाल है। जब आप ने एक दूसरे की कमियाँ गिनाकर, गालियां देकर वोट मांगे तो अब गलबहियाँ कैसे कर सकते हैं? उत्तर है : संविधान इसकी इजाज़त देता है। जब कि होना यह चाहिए कि चुनाव पूर्व गठबंधन मे अगर सत्ता की मलाई बांटने मे सहमति नहीं बनती तो सभी को वापस जनता की राय लेनी चाहिए, अनिवार्य रूप से। चुनाव के बाद किसी भी तरह का गठबंधन अनैतिक है। अगर हमारा संविधान इस अनैतिकता को न्यायसम्मत मानता है तो उसमें संशोधन की आवश्...
ये प्रांशू हैं। पिलास्टिक का मग्घा पाकर खुश हैं। एक उद्धव भैया हैं, उप मुख्यमंत्री की कुर्सी और आधा राजपाट मिलने के बाद भी खुश नहीं। खैर, हमको क्या। हमको तो इन भैया से मतलब। अभी गेहूं बोने के लिए खेत की छपाई कर रहे हैं, मतलब पानी लगा रहे हैं, मतलब सिंचाई कर रहे हैं। इनके साथ इनकी छोटी बहन प्रियांशी और अम्मा भी हैं। दुकान से बिस्कुट लेने गए थे, हमको रास्ते मे मिल गए। इनका कप नीले रंग का है तो जाहिर है कि प्रियांशी का कप ज्यादा चमकदार गुलाबी रंग का होगा। प्रियांशी की अ म्मा की ख़ुशी भले आप घूँघट की वजह से देख न पा रहे हों, पर वह हैं। उधर ऊधौ भैया के दुलरुआ को चाहे सोने का कप दे दो तो भी वह खुश न होंगे। खैर, हमको क्या करना जी। अपुन तो बस अईसेइच ख़ुश है।
चुनावी ऋणपत्र और अलाने-फलाने अच्छा, चुनावी ऋणपत्र ( इलेक्टोरल बॉन्ड ) का खेला भी कमाल का है। भारतीय राजनीति के महान अर्थशास्त्री श्रीमान अरुण जेटली जी के चाहने वाले सभी दलों में ऐसे ही नहीं भरे पड़े हैं। यह उन्ही का दिमागी बच्चा है। इसको सरल भाषा में ऐसे समझिए। एक हैं अलाने जिनको पाल्टी पूरे चुनाव भर पानी पी-पी कर गरियाती है। दुनिया जानती है कि अलाने के नंबर दो के धंधे हैं। पाल्टी के अब्बा, ताऊ, चाचा, भतीजा उसको सुबह - शाम गाली देने के बाद नाश्ता करते हैं। पर मुश्किल यह है कि न तो अलाने का काम पाल्टी के बगैर चल सकता है और न पाल्टी का काम अलाने के बगैर। तो बस इसी के लिए इलेक्टोराल बॉन्ड नाम का खेला, खेला जाता है। आइये देखते हैं कैसे। अलाने को अपना काम कराने के लिए ( मतलब जनता का खून चूसने के लिए ) पार्टी ( सरकार पढ़ा जाये ) को सौ ( करोड़ आदि पढ़ लिया जाये ) रुपये का चढ़ावा चढ़ाना है। बैंक के पैसे अलाने पार्टी को देना नहीं चाहते। एक तो बैंक मे पैसे डालने-निकालने की उनकी आदत नहीं और दूसरे कल को बात खुले तो पाल्टी को दिक्कत हो जाने का। अच्छा खैर, तो अलाने ने एक सौ दस रुपये के बोरे...
पचहत्तर साल की उम्र के बाद समाज को आपकी जरूरत नहीं ----------------------------------------------------------------- एक पचहत्तर साल का भला चंगा आदमी एक दिन अचानक बीमार पड़ जाता है l अब बीमार तो कोई भी हो सकता है l हमारे पूर्व प्रधानमन्त्री आदरणीय अटल बिहारी वाजपेई जी भी पिछले कई बरसों से गंभीर रूप से बीमार चल रहे हैं l लेकिन हम लाखों देशवासियों की यही इच्छा है कि अभी वह जीवित रहें l परन्तु यहाँ मैं पचहत्तर साल के उस भले आदमी की बात कर रहा हूँ जो आज से दो महीने पहले अचानक से बीमार पड़ गया l जैसा कि अमूमन होता है उन्हें भी शहर के सबसे बड़े माने जाने वाले अस्पताल संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराने की कोशिश की गई l यहाँ पर यह बता देना उचित रहेगा कि बीमार हुआ व्यक्ति स्वयं एक डॉ है l 1960 बैच केजीएमसी का यह छात्र राज्य के स्वास्थ्य विभाग से संयुक्त निदेशक के पद से अवकाश प्राप्त हैं l दशकों तक मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट और सीएमओ के पद पर रहते हुए हजारों मरीजों का स्वास्थ्य ठीक करने वाले इस भले आदमी के लिए सरकारी अस्पताल में कोई जगह नहीं थी l बात बिलकुल ठीक भी थी कि किसी बीमार ...
पुराने साल की फेयरवेल पार्टी ------------------------------- पुराने साल की विदाई, मतलब धूम धड़ाका, संगीत और खाना l तो साहबान हम लोग भी डीजल रथों में सवार कच्चे रास्ते पर धूम धडाम करते यानी गड्ढों में गिरते पड़ते पहुँच गए, पुराने वर्ष को विदा करने l पुराना साल बेचारा आख़िरी साँसें ले रहा था l हमारे पहुँचते ही कदम के पेंड़ का सहारा लेकर खडा हो गया l मरियल सी आवाज़ में बोला, अब आ ही गए हो तो कुछ खा पी कर जाना l हमने उसकी बात नहीं टाली l पहले भुने हुए आलू पर हाँथ साफ़ किये फिर शकरकंद पर l शकरकंद खाने के बाद गाजर कुछ कम मीठे लगे लेकिन हमने इस बात का बहुत बुरा नहीं माना l गाजर ने भी नहीं माना होगा, ऐसा मेरा अनुमान भर है l हाँ इसके पीछे - पीछे आई मूली ज़रा सा गैरमामूली बर्ताव करते हुए जबान को कुछ तीखा सा जवाब दे गई l हमने भी उधर ज्यादा ध्यान न देते हुए फिर से गाजर पर थोड़ा ध्यान दिया l फिर मटर महारानी ने तो मूली के बारे में सोचने का मौक़ा तक नहीं दिया l अभी यह सिलसिला चल ही रहा था कि पम्प से गिरते हुए पानी के संगीत ने अपनी तरफ ध्यान खींचा l टिटिहरी ने उसमे जोरदार संगत की और मोरों ने समवेत स...
सकठ ------ सबसे पहले ख़त्म होती थीं मूंगफली की धुंधिया फिर रामदाना और चने की ( अँधेरे में मूंगफली और चने की धुंधिया हांथों से पहचानना थोड़ा मुश्किल था l जो बिलकुल गोल हो, वह चने की l मूंगफली की धुंधिया कभी भी पूरी गोल नहीं होती ) फिर क्रमशः गेंहूं के लड्डू, तिल की धुंधिया, लईया का धूंधा, जोन्हरी का धूंधा ( इसका साइज़ इतना बड़ा होता था कि हम बच्चे दोनों हाथों से ही पकड़ पाते थे ) बाजरे के लड्डू और सबसे आखिर में ख़त्म होते थे चावल के लड्डू l इनके ख़त्म होते होते जाड़ा भी लगभग ख़त्म हो चलता l चावल के लड्डू तो इतने खतरनाक ढंग से कठोर हो जाते थे कि कभी कभी खोपड़ी फोड़ने के काम भी आते l आज गांव में घुसते ही जब एक चार - पांच साल के बच्चे को तीन बुस्कट के ऊपर दुई ठो सूटर पहन कर साथ में एक लाल रँग का चीकट कनटोप बांधे हुए नाक बहाते और लईया का धूंधा खाते हुए देखा तो समझ गया कि सकठ आसपास ही होगी l एक बार मैं इसी वेश भूषा में एक बड़ी डहरी की तली में रह गए जोंधरी के धूंधे निकालते हुए सर के बल डहरी के अन्दर गिर गया था l
कन्हैया लाल नंदन, ' इंडिया टुडे साहित्यिक वार्षिकी ' और कोट का कमाल ------------------------------------------------------------------------------ 1. लखनऊ एअरपोर्ट में सिक्योरिटी चेक के पहले ही दाईं तरफ एक किताबों की दूकान हुआ करती थी जो इस बार गायब मिली l समय था तो ऊपर तक झाँक आए पर किताबों का छोटा सा कोना जो कम से कम होना ही चाहिए था,अब नहीं था l लखनऊ एअरपोर्ट पर हिन्दी की किताबें काफी संख्या में उपलब्ध हुआ करती थी l कुछ हिन्दी की पत्रिकाएँ भी मिल ही जाती थीं l खैर, मेरे है ण्ड बैग में कन्हैया लाल नंदन जी अपनी आत्मकथा ' गुजरा कहां कहां से ' के कवर पेज पर ईत्मीनान से मुस्कुरा रहे थे l अचानक मुझे फेसबुक मित्र और मेरे प्रिय व्यंग्यकार अनूप शुक्ल जी की मुस्कराहट याद आ गई l अनूप जी नंदन जी के भांजे हैं और नंदन जी अनूप जी के बिलकुल मामा लग रहे थे l फेसबुक पर अनूप जी ने इतनी बार याद दिलाया है कि मैं देखते ही पहचान गया l एअरपोर्ट ही अक्सर मुझे पाठक बनने का सौभाग्य प्रदान करता है l तो नंदन जी के साथ हम भी उनके गांव परसदेपुर में बाबा देवीदयाल तिवारी के साथ हेडमास्टर श...
चुनावी ऋणपत्र और अलाने-फलाने अच्छा, चुनावी ऋणपत्र ( इलेक्टोरल बॉन्ड ) का खेला भी कमाल का है। भारतीय राजनीति के महान अर्थशास्त्री श्रीमान अरुण जेटली जी के चाहने वाले सभी दलों में ऐसे ही नहीं भरे पड़े हैं। यह उन्ही का दिमागी बच्चा है। इसको सरल भाषा में ऐसे समझिए। एक हैं अलाने जिनको पाल्टी पूरे चुनाव भर पानी पी-पी कर गरियाती है। दुनिया जानती है कि अलाने के नंबर दो के धंधे हैं। पाल्टी के अब्बा, ताऊ, चाचा, भतीजा उसको सुबह - शाम गाली देने के बाद नाश्ता करते हैं। पर मुश्किल यह है कि न तो अलाने का काम पाल्टी के बगैर चल सकता है और न पाल्टी का काम अलाने के बगैर। तो बस इसी के लिए इलेक्टोराल बॉन्ड नाम का खेला, खेला जाता है। आइये देखते हैं कैसे। अलाने को अपना काम कराने के लिए ( मतलब जनता का खून चूसने के लिए ) पार्टी ( सरकार पढ़ा जाये ) को सौ ( करोड़ आदि पढ़ लिया जाये ) रुपये का चढ़ावा चढ़ाना है। बैंक के पैसे अलाने पार्टी को देना नहीं चाहते। एक तो बैंक मे पैसे डालने-निकालने की उनकी आदत नहीं और दूसरे कल को बात खुले तो पाल्टी को दिक्कत हो जाने का। अच्छा खैर, तो अलाने ने एक सौ दस रुपये के बोरे...
1962 : हार की जीत ---------------------- आज से ठीक सत्तावन बरस पहले 21 नवम्बर, 1962 को चीन ने हमारी नाक जमीन पर रगड़ कर एकतरफ़ा युद्ध विराम की घोषणा कर दी थी l जाहिर है आज का दिन हमारे लिए कोई गौरवशाली दिन तो है नहीं l हमारे लिए यह इतिहास का काला दिन है, एक भुला देने वाली तारीख l एक महीने चले इस युद्ध में चीन ने हमें धूल और बर्फ दोनों चटाई l हम वीरता से लड़े और बुरी तरह हारे, लेकिन क्या हम 1962 की लड़ाई को सिर्फ़ चीन की जीत और भारत की हार के रूप में ही याद करते रहेंगे? किंग्स कॉलेज, लन्दन की इतिहास की प्रोफ़ेसर बी जी रिचर्ड इस युद्ध के दूसरे आयाम पर बात करती हैं l वो कहती हैं कि जब नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी " NEFA " ( आज का अरुणाचल प्रदेश ) से सारे भारतीय अधिकारी और कर्मचारी अपने अपने ऑफिस छोड़ कर भाग गए, तब वहाँ की जनता को भय था कि चीन की सेना उनके साथ न जाने क्या क्या करेगी? अब युद्ध विराम के बाद भारतीय अधिकारी भी वापस आने में बहुत भयभीत थे कि न जाने वहाँ की स्थानीय जनता का व्यवहार उनके साथ कैसा होगा ? पता चला कि चीन की सेना के जवानों ने उस दौरान किसी भी नागरिक से बदसल...
# एक_मामूली_यात्रा_का_विशद_आख्यान #1 पिताजी की उम्र पचासी पार है। यह बात वह रोज सबको बताते हैं लेकिन खुद को अट्ठावन से ज्यादा नहीं समझते। उनकी ऊर्जा को देखते हुए मुझे वह कभी-कभी अट्ठारह से ज्यादा के नहीं लगते हैं। अच्छा खैर! ' अच्छा खैर! ' उनका तकिया कलाम है। मतलब क्षेपकों को विराम देते हुए मुख्य कहानी पर फिर से आया जाय। अच्छा खैर ! वह कल गाँव गए थे, सो पूरा किस्सा उनको बताना है, सिलसिलेवार। सुबह मॉर्निंग वाक के लिए निकलते हुए जब मैंने खुद को घिरता हुआ महसूस किया तो इस वादे के साथ भाग खड़ा हुआ कि बस अभी लौट कर आया। हालांकि वह चाह रहे थे कि संक्षिप्त संस्करण अभी ही सुन लिया जाये। लौटते ही मैं अखबार लेकर बैठ गया और आख्यान चालू आहे। अखबार भला कैसे पढ़ता, मैं तो पिताजी के साथ गाँव चला गया था। जिस यात्रा मे उन्हे कल दस घंटे लगे वह उन्होने मुझे घर बैठे चालीस मिनट मे करवा दी। अच्छा खैर, आप लोग उनकी यात्रा मे सम्मीलित होना चाहें तो आराम से दिमाग को सुस्ताने के लिए निकाल कर मेज पर रख लीजिये और आंखे बंद कर हुंकारी भरते रहिए। जारी..... [ चेतावनी : यह कोई जबर्दस्त घटनाओं...
फरेंदा : एक याद --------------------- पेड़ों के झुरमुट से निहुर कर जहां पर लम्बवत सूरज की किरणें धरती को चूम रही हैं, ठीक उसी जगह पर एक विशाल जामुन का पेड़ हुआ करता था l दरअसल जामुन का नहीं वह फरेंदा का पेड़ था l गंवई बातचीत में जामुन का मतलब कठ्जमुनी से होता जो स्वाद में और आकार में फरेंद से काफी निचले पायदान पर रखी जाती थी l उम्र रही होगी यही चौदह - पंद्रह l हम दो जने ठीक दोपहर में करीब पंद्रह फीट ऊंची इसकी एक मोटी सी डाल पर खड़े हो उचक उचक कर रसीले फरेंद साथ लिए कपड़े की झोली में रख रहे थे l अचानक कुछ टूटने की आवाज़ आई और अगले पल हम दोनों डाल सहित धूल चाट रहे थे l जो सबसे पहले दो बातें दिमाग में तुरंत आईं वह थीं पिताजी का तमतमाया चेहरा और फरेंद की झोली l झोली में रखे फरेंदों ने एक बड़ी सी मॉडर्न आर्ट, गन्दगी और धूल से पीली हुई बनियान पर बड़े सुरुचि पूर्ण तरीके से छाप दी थी l गहरा जामुनी रँग बनियान को बेधता हुआ पेट और सीने पर भी शोभायमान था l दोनों कुहनियों और एक घुटने पर लाल रँग के धब्बे धूल द्वारा लगभल कैमोफ़्लाज हो गए थे l घर जाते समय थोड़ी देर लंगडा कर चलने के बाद चाल फिर से मृग...
लखनऊ की साहित्यिक हवाओं में इन दिनों नए रंग घुल रहे हैं। इसे आने वाले बसंत की रंगबाजी नहीं समझना चाहिए बल्कि यह रंगरेजी मिज़ाज कुछ उभरते हुए शब्दकारों का पैदा कि या हुआ है। ये एकांतवासी रंगरेज साहित्यिक गहमागहमी से दूर साहित्य की अनेक विधाओं के नव्य रूपाकार गढ़ रहे हैं, उनमें चटक रंग भर रहे हैं। नए रूप रंग के ये शब्दचित्र बेबस ही आमंत्रित करते हैं कि आओ मुझे पढ़ो, मेरी जीवंतता को महसूस करो। इनमें जीवन का सौंदर्य है, ठसक है, वंचना की पीड़ा है, कसक है।इनमें से एक रंगरेज हैं मेरे प्रिय मित्र  प्रदीप शुक्ल । पेशे से स्वर्ण पदक प्राप्त बाल चिकित्सक हैं। व्यक्तिव में ”भवन्ति नम्रस्तरव: फलौद्गमै:” ‘(फल आने पर द्रुम स्वत: ही झुक जाते हैं) वाली नम्रता जैसे घुट्टी में मिली हो। उनसे बात करने का समय नियत है, दोपहर 1-30 से 3-00 बजे तक, जब उनकी ओ पी डी का इंटरवल होता है। शेष समय वे नन्हें-मुन्नों के बीच आला लगाये नवजातों की धड़कनों और मुस्कुराहटों में कवितायें ढूंढते रहते हैं। बमुश्किल दो वर्ष पूर्व उन्हें कविताई का चस्का लगा। इस दो वर्ष में उन्होने एक से एक गीत-नवगीत, मुकरियाँ, कुंडलियाँ, दोहे अवध...