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  !! भइया हम तो खेतिहर किसान !! अब तीन पांच हम का जानी भइया हम तो खेतिहर किसान !! तुम हमरे बल पर दौरि रह्यो हमही का आँख देखाय रह्यो चाहै तुम वहिका डबल कहौ गेहुंऐ की तो रोटी खाय रह्यो जब हम तुम्हरे शहर आई तुम नाक सिक्वारति हौ भईया तुम ऐसे हम का हांकति हौ जैसे हम हन तुमरी गईया जो तुमका हम दुतकारि देई कैसे बचिहैं तुमरे परान भइया हम तो खेतिहर किसान अब तीन पांच हम का जानी भइया हम तो खेतिहर किसान !! टी बी के अन्दर बैठ बैठ बढ़िया बढ़िया बातै करिहौ ऐसन लागी बस अबहीं तुम हमरे पायन माँ सिरु धरिहौ मौक़ा मिलतै तुम तो हमरे पीठी माँ छूरा भोंकि देतु बस हमरा नाम लगाय क तुम अपनी ही रोटी सेंकि लेतु हम तो गरीब मनई हमका तुम काहे कीन्हे हौ परेशान भइया हम तो खेतिहर किसान अब तीन पांच हम का जानी भइया हम तो खेतिहर किसान !! जैसे चुनाव नजदीक आई तुम पहिरि क खद्दर दौरि लिह्यो दिन राति पैंलगी मारि रह्यो तुम हमरे सथहै ज्योंरि रह्यो हम जानिति चुनाव मा जीततै तुम फिरि पांच बरस तक ना अइहौ जो तुमका हम ना वोट दीन तौ सबके समहे गरियइहौ हमका समझावै क रहै देव हम जानिति सब धंधा पुरान भइया हम तो खेतिहर किसान अब तीन पांच हम का ...
  यहिमा उलरै कै कउन बात? ------------------------------ दारू पी कै ल्वाटै लागेव खावव घर मा तुम दूधु भात यहु नवा सालु फिरि-फिरि आई यहिमा उलरै कै कउन बात? घुरहू ख्यातन मा कांपि रहे मुरहू होटल मा मजा करैं घुरहू हैं साँड़न के पीछे मुरहू गिलास मा बरफ भरैं कुरिया मा घुरहू हैं अक्याल मुलु देस म मुरहुन कै जमात कुछु लोग सुरसुरी छोंड़ि दिहिन जुम्मन अंदर ते कांपि रहे कुछु लोग धुआं सुलगाय दिहिन दुरिही ते आगी तापि रहे कुछु लीन्हे हैं सतरंज बइठ बसि खेलि रहे सह अउर मात हमहू कंबल मा घुसे बईठ औ मुलुर-मुलुर बस झांकि रहेन तुमहू जो मन मा वहै करौ हम सन्न-गन्न बस हांकि रहेन जब-जब हम जादा सोचि लेइ तब-तब हमारि मूड़ी पिरात - प्रदीप कुमार शुक्ल ( 2019 )
  सुरूऐ साल मा करोना आवा अउर फिर सालु भरि रोना आवा दवाई कउनिव अबै नहिंयै आई थारी बाजि काका क टोना आवा दूधु कूकुर बिलार सब पिया कींहिन हमरे हिस्से म छूँछ भगोना आवा यादि फिरि आईं बहुतु अम्मा हमका जइसहे थारी मा निमोना आवा अउरे सालन हुड़दंगु रहै, मउज रहै ई करोना म हीटरु धरा कोना आवा - प्रदीप कुमार शुक्ल ( 2020 )
  दशरथ नंदन हौ कहाँ, कहाँ छुपे हौ राम जल्दी ते अवतरौ तुम, तुमते बीसन काम तुमते बीसन काम, परा है छपरा छावा तीन दफा गोहराय, कोउ झाँकै ना आवा रावन घूमै गांव, लगाए माथे चन्दन बांदर गे पग्ल्याय, कहाँ हौ दशरथ नंदन - प्रदीप कुमार शुक्ल
  रहिमन सिट साइलेंटली, घर मा पूँछि दबाय बाहर वॉकिंग कोरोना, दउरि क लेइ उठाय।
चांद अउर तारे अउर दुनिया / चार्ल्स बुकोव्स्की ------------------------------------------------- राति मा दूरि तक टहरति बखत- आतमा जुड़ाय जाय : जब निगाह खिरकिन पर अटकति है देखि कै दिन भर की थकी मेहरारुन का जिउ भरि लडै़ कै कोसिस करति दारू मा धुत्त अपने मंसवन ते l ( अवधी प्रस्तुति : प्रदीप शुक्ल )
हम तोरई के फूल ------------------ तुम गुलाब के गुलदस्ता हौ हम तोरई के फूल तुम तन पानी के फव्वारा हमरी कइती धूल तुमका मलकिन हउले हउले सुबा - साम सोहरावैं उलरि उलरि कै बोकरी हमका नोचि नोचि कै खावैं जानु बचावै खातिर हम तो रहेन छपरिया झूल खूनु पी गयो तुम हमार सब, होइगे चेहरा पीले लेकिन हमका मारि न पइहौ हमहू बहुत हठीले घूरे पर हम मुसकाई, दुख आपन सारे भूल तुमरी तना भले हम मंदिर भीतर जाय न पाई लेकिन पेटे केरि आगि हम अच्छी तना बुझाई तुम देउतन के साथ रहौ हम जनता के अनुकूल - प्रदीप शुक्ल
क्वाड्रीलेटरल ------------- जब तब आंखि देखावै हमका यहु दहिजरवा चीन काका हमरे ढूंढ़ि लाय हैं द्याखौ साथी तीन अमरीका तो दउरि क हमते तुरतै हाथु मिलाइसि असटरेलिया के काने मा वहै कुछो समझाइसि दुखी बइठ जापान चीन ते रिस्ता है नमकीन पाकिस्तान चीन के पायँन मा गिरि गिरि कै ल्वाटै बदले मा वहु सांपन कइहाँ दूधु बतासा बांटै उनहुन का ई डसिहैं, चीनी भले बजावैं बीन क्वाड्रीलेटरल चौराहे पर भारत बींधैं माला फिलिपीन्स औ वियतनाम के सोहरावति है छाला मुस्किल हैं कसि पावैं सब मिलिकै ड्रैगन पर जीन - प्रदीप शुक्ल
मूंगफली लइ आयेव बप्पा -------------------------- मूंगफली लइ आयेव बप्पा जब लौटेव बाजार ते बार बार तुम भूलि जा रहेव है पिछले अतवार ते धनिया वाला नमकु सूखि गा मूंगफली ना आई तीन दिनन ते लगातार हम सपने मा बसि खाई लइ ही आयेव बप्पा अबकी चाहे लायेव उधार ते सूटरु चिथरा होइगा लेकिन लागि रहा ना जाड़ा सक्कर भले न लायो हम पी लेबै करुआ काढ़ा हमरे खातिर मूंगफली तुम मांगि लायेव सरकार ते होइगा होय चुनाव जो पूरा बप्पा उन ते बोलेव किरपा केरि गठरिया थोरी हमरेव गांव म खोलेव हमरे भूखे प्याटन कईहाँ जोड़ि लेव आधार ते - प्रदीप शुक्ल
लालु ----- उठि जाव लालु उठि जाव लालु द्याखौ आवा है नवा सालु चिरई चिरवा सब खोजि रहे तुमका, तुम परे रजाई मा पढ़ि रहा पहाड़ा जाड़ु अबे ठंडक धरि दिहिसि दहाई मा कोहिरा मा सूरजु अटकि रहा वहु पूछि रहा तुमते सवालु उठि जाव लालु उठि जाव लालु द्याखौ आवा है नवा सालु आंखी ख्वालौ - आंखी ख्वालौ अब सोए ते ना कामु बनी तुमरे दूधे खातिर द्याखौ कूकुर - बिलारि मा रारि ठनी अब जगौ किरनियाँ आय गईं बइठीं सिरहाने छुएं गालु उठि जाव लालु उठि जाव लालु द्याखौ आवा है नवा सालु ई नए साल मा बचुआ तुम बसि राह चलेव सच्चाई की थ्वारा अपने मन ते स्वाचौ अब उमिरि नहीं गभुआई की कोसिस कीन्हेव लल्ला हमार तुम चलेव न सपनेव मा कुचालु उठि जाव लालु उठि जाव लालु द्याखौ आवा है नवा सालु - प्रदीप शुक्ल
अवधी हमारि - अवधी हमारि ------------------------------ अवधी हमारि - अवधी हमारि, हमका सबते जादा पियारि ई धरती पर आंखी ख्वाला तब हमका तुम कउरियाय लिहेव सोहर गाएव बन्ना सुनाएव जब रोयेन, हमका बेल्ह्माय दिहेव बचपन मा अम्मा का दुलारु तुम अबहूँ तक रक्खेव संभारि अबहूँ बाबा का यादि करी हम मानस की चौपाई ते सपने मा अवधी बोलिति है अबहूँ हम भईंसी गाई ते मौक़ा मिलतै अंगरेजी कै धरि देइति हम केंचुल उतारि अब बहुत दिनन ते सुनेन नहीं तुमरी मीठी मीठी गारी वहु किस्सौ कोउ सुनावै ना जब रमई काका गे ससुरारी बोले कहे रहौ घर मा नाहीं, बचुआ देहैं बिसारि - प्रदीप शुक्ल
अरे ब्वाल्ह रे! रामराज कै यह तैयारी, अरे ब्वाल्ह रे सांड़न का रातिब सरकारी, अरे ब्वाल्ह रे जुम्मन मियाँ कहूँ जो जोर ते सांस लिहिन एतनी बात प बीसन गारी, अरे ब्वाल्ह रे एक्का दुक्का भले अबे मिलि जाएँ मगर माननीय सारे ब्यभिचारी, अरे ब्वाल्ह रे पूर पजावा खंजरु निकरा देखि परै कदम कदम पर है बीमारी, अरे ब्वाल्ह रे नीरव मोदी ट्वर्रा कीन्हे है म्वाछै लेहे करोड़न केरि उधारी, अरे ब्वाल्ह रे राजा जी के चढ़ा घोड़इयाँ घूमि रहा भरी सभा जो खीन्चै सारी, अरे ब्वाल्ह रे जी कुकुरन ते मुखिया रोजु सिकार करै उनका वहु कइसे दुतकारी, अरे ब्वाल्ह रे जहिके मंदिर मा मानवता बिलखि परी कइसे हम आरती उतारी, अरे ब्वाल्ह रे धारा तीन सौ सत्तरि फूँकि उड़ा दीन्हेव मानि गएन तुम हौ अवतारी, अरे ब्वाल्ह रे - प्रदीप शुक्ल
महाबली पहलवान --------------------- महाबली हम जीतति जाई एकुई एकु अखाड़ा हारि गवा जो हमते, वहिके टोपी कपड़ा फाड़ा कउनिव नियम नहीं कुस्ती के सबका घेरि क मारब हारिउ गयन तो तुरतै उठिकै जीत - जीत चिग्घाड़ब दुसरे के डंडा पर दउरि क आपन झंडा गाड़ा पच्छिम ते घोड़ा चलि दीन्हेसि पूरब जाति डेराय हरी घास मिलिगै तौ वहिका कूदि - कूदि कै खाय डेरु है दलदल मा फंसाय कै कहूं न जाए कांड़ा को टिकि पाई हमरे समहे हम तो हन अवतार मानौ कहा सब जने आपन फेंकि देव हथियार आव हियाँ सब हमते सीखौ दुइ दुनी आठ पहाड़ा - प्रदीप शुक्ल
अच्छे दिनन क ताकि रहेन ------------------------------ स्वाचा रहै हम तो सब दुख हमार जरि जइहैं लागति है सुख मुला फांसी लगाय मरि जइहैं आंखी पथरानी हैं अच्छे दिनन क ताकि रहेन अउर देर लागी तो र्वावां हमार बरि जइहैं सांड़ जेतने हैं पहुँचाव सब कानीहउदै नहीं तो ख्यात - ख्यात खूंटु - खूंटु चरि जइहैं नई बयार नई धूप देखावा जाए नहीं अचार जस बिचार सबै सरि जइहैं भलेमानस बनौ पंगा न लेव धरती ते कहूं जो गुस्सानि तौ पुरिखा तुम्हार तरि जइहैं ई जउन ताज लेहे आसमान दउरि रहे मरै के बेरिया सब उतारि हिएँ धरि जइहैं - प्रदीप शुक्ल
अरे ब्वाल्ह रे! रामराज कै यह तैयारी, अरे ब्वाल्ह रे माननीय सारे ब्यभिचारी, अरे ब्वाल्ह रे पूर पजावा खंजरु निकरा देखि परै कदम कदम पर है बीमारी, अरे ब्वाल्ह रे राजा जी के चढ़ा घोड़इयाँ घूमि रहा भरी सभा जो खीन्चै सारी, अरे ब्वाल्ह रे जी कुकुरन ते मुखिया रोजु सिकार करै उनका वहु काहे दुतकारी, अरे ब्वाल्ह रे जहिके मंदिर मा मानवता बिलखि परी कइसे हम आरती उतारी, अरे ब्वाल्ह रे - प्रदीप शुक्ल
मँगरू काका मँगरू काका ख्यात मा, नींम्बी तरे जुड़ायँ मोबाइल ते लरिकवा, पढ़िकै रहा सुनाय पढ़िकै रहा सुनाय, चलि परे फिरि ते धोनी लउटे घरै किसान, कहूं ना भै अनहोनी अमरीका तैयार, कोरिया फिरि ते झाँका अडवाणी के हाल, पूछते मँगरू काका - प्रदीप शुक्ल
काका तीनि बार चीन क्यार चक्करु लगाय आय चौथी बार फिरि द्याखौ जाय रहे काका डोकलाम मइहाँ जो म्याड़ काटे घूमि रहा वहिका फिरि काहे सोहराय रहे काका? दुसमन का हमरे जउनु कनिया चढ़ाय घूमै आंखि बंद कीन्हे हैं चुपाय रहे काका यू एन मा जउनु चीन हमका अघवाय रहा वही के दुआरे मुसकाय रहे काका - प्रदीप शुक्ल
आप तुम धूर्तन के टोला निकरेव बाँह म घुसे संपोला निकरेव हम जाना गांधी का चसमा तुम तौ ठगन क झोला निकरेव अमरितु का तुम वादा कीन्हेव लेकिन कोकाकोला निकरेव तुमरे दम पर रहै लड़ाई दगा भवा तुम गोला निकरेव अरबी घोड़ा समझेन तुमका खच्चरु मुला मंझोला निकरेव आप ते ठोस उमीदें बांधा आप तो बिल्कुल पोला निकरेव -डा. प्रदीप शुक्ल
तुम टुकुर - टुकुर द्याखौ --------------------------- हम नंग नाचु नाची तुम टुकुर - टुकुर द्याखौ हम बाँधि - बाँधि साफा फिरि बड़ी - बड़ी हांकी यहु देसु घुग्घु बनिकै बस मुलुर - मुलुर झांकी हम दूध ते नहाई तुम पेटु बाँधि राखौ हम देसु का करावा है बीस साल पट्टा तुम छुइ जो कहूं लीन्हेव तौ मारि द्याब चट्ठा हम गाइ जब मल्हारै तुम परे हुआँ कान्खौ हम फारि द्याब बादरु जौ हमै मना कीन्हेव अवतारु हमै समझौ तुम भले नहीं चीन्हेव हम जउन - जउन बोली तुम बात वहै भाखौ - प्रदीप शुक्ल
पहिली बारिस की बौछारैं पहिली बारिस की बौछारैं अस धरती ते रहीं बतलाय जइसे बिछुरी रहैं सहेली मिली तो गरे लिहिन लपिटाय सोंधी महक उठी धरती ते सगरे फूल गए सरमाय मस्त मुरैला ठुम ठुम नाचै पखना सबै दिहिस फैलाय सूखी दूब के सूखे ह्वांठन पानी मिला आइ मुसकान बूँदी लटकि रहीं हैं अइसे जइसे झुमकी लटकैं कान कुछु बूँदै लीन्हे पुरवइया उनका झुलुआ रही झुलाय जादू है वहिके हान्थन मा द्याखति द्याखति गईं बिलाय कुछु बूँदै धरती का चूमैं कुछु पातन ते रहीं बेल्हराय कुछु तो लटकि रहीं फूलन ते अउर चुटकुला रहीं सुनाय खुसुर फुसुर धरती ते कीन्हिनि आपन दुखड़ा रहीं बताय आँसन के फिरि बहे पनारा धरती रोय परी बुम्बुआय - प्रदीप शुक्ल 28 जून, 2018