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अब मान लो आपका कोई दोस्त कमरे में फटेहाल लेटा है. उसका मन रसगुल्ला खाने का है पर मुश्किल यह है कि उसकी जेब में पैसे नहीं हैं. परन्तु आपके पास भी इतने पैसे नहीं हैं कि स्विगी या ऊबर ईट्स से आप दोस्त के लिए रसगुल्ला भिजवा सको.
तो आप उसे न्यूज़ पढ़कर सुना सकते हैं, सूचनाएं दे सकते हैं जैसे कि जर्मनी के किसी गाँव में एक सूअर दम्पति ने एक साल में छप्पन बच्चे जन्मे या मुजफ्फरपुर में एक सप्ताह में छप्पन बच्चे इस गोले से विदा हो गए और जिससे आक्रोशित गाँव वालों ने एक विधायक जी को बंदी बना लिया. पैसे देकर विधायक जी छूट भी गए.
विश्वास मानिए आपकी दी हुई उन सूचनाओं से जिनसे आपके दोस्त का कोई लेना देना भी नहीं है, ( वह तो बेचारा मुखर्जी नगर के एक कमरे में चार सालों से चारपाई पर लेटा पैसे ही कमा रहा है, यह उसे पता ही नहीं चला ) को बिलकुल उतना ही सुख प्राप्त होगा जितना उसे रसगुल्ला खाने या उसके पेटीएम वैलेट में पैसे आ जाने पर होता.
बिलकुल ताजा शोध से पता चला है कि सूचना मष्तिष्क को बिलकुल वैसे ही पुरस्कृत करती है जैसे पैसा या बढ़िया खाना. कैलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, अमेरिका की प्रोफ़ेसर मिंग सू ( हू ) ने एक ख्यातिप्राप्त जर्नल में यह बताया कि दरअसल पैसे, सूचनाओं और भोजन के लिए मष्तिष्क एक ही कॉमन कोड बनाता है और उसी कॉमन कोड से ही उत्तेजित होता है.
बिलावजह एक मिनट में तीन बार जो हम मैसेज बॉक्स खोल - खोल देखते हैं दरअसल हम बस पैसे कमा रहे होते हैं.
तो अब देर किस बात की. उठाइये फोन और लगाइए बैंक मैनेजर को अपने लोन किश्त की तारीख पर.
- प्रदीप कुमार शुक्ल

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