Skip to main content

Posts

Showing posts with the label बालगीत
  चींटे का पड़ोसी एक पड़ोसी लड़ने आया बना आग का गोला चींटे ने शक्कर खाई फिर मीठा - मीठा बोला चींटी आई, मुसकाई जब मीठा शरबत घोला जाते हुए पड़ोसी ने तब बदला अपना चोला - प्रदीप कुमार शुक्ल ( 2021 )
  सूरज बेटा सुबह सबेरे बिस्तर से जब सूरज उतरा मंजन कर फिर उसने थोड़ा कुहरा कुतरा उत्तर को चल पड़ा बदल दीं अपनी राहें धरती अम्मा ने फैला दी दोनों बाहें अम्मा बोलीं-बेटा, खिचड़ी खा कर जाना लेकिन उसके पहले तुमको पड़े नहाना सूरज भागा फिर से कर के वही बहाना मम्मा मुझको छत पर अभी पतंग उड़ाना - प्रदीप कुमार शुक्ल ( 2021 )
  चींची और उसकी मम्मी चींची लगातार मम्मी से झगड़ रही थी अपनी चोंच घोसले में रगड़ रही थी मम्मी उसके पंखों को सहला रही थी गाना गाकर, थपकी दे सुला रही थी चींची बोली-मैं जरा बाहर झांक लूं न बेटा, बाहर खड़ा है ' एवियन फ़्लू ' मम्मा, जैसे मुन्नू के घर के आगे ' कोरोना?' इतना कहते ही चींची को आ गया रोना बोली, मुन्नू को तो अब वैक्सीन लग जाएगी पर मम्मा, हमारी वैक्सीन कब आएगी? सोचो अब मम्मी, चींची को क्या बताएगी? - प्रदीप कुमार शुक्ल ( 2021 )
  इस छुट्टी में / प्रदीप शुक्ल इस छुट्टी में आओ बच्चों चलें गाँव की ओर मोटरगाड़ी, मॉल, सिनेमा से कुछ दिन की छुट्टी ए सी कूलर से कर लें हम थोड़े दिन तक कुट्टी छोड़ चलें हम महानगर का यह बड़बोला शोर इस छुट्टी में आओ बच्चों चलें गाँव की ओर आओ देखें चलकर खेतों में फैली हरियाली बासों के झुरमुट में रस्ता देखे कोयल काली यहाँ देख कर दिन भर टी वी हो जाओगे बोर इस छुट्टी में आओ बच्चों चलें गाँव की ओर छत पर चंदा के संग होंगी प्यारी दादी नानी ले जायेंगे साथ यहाँ से अपनी मच्छरदानी चिड़िया बोलेंगी कानों में उठो हो गई भोर इस छुट्टी में आओ बच्चों चलें गाँव की ओर सुबह सबेरे किरणें करती मिल जायेंगी जादू ओस बनी मोती की माला दिखलायेंगे दादू पापा से बोलो चलना है ज़रा लगा कर जोर इस छुट्टी में आओ बच्चों चलें गाँव की ओर. # डॉ. प्रदीप शुक्ल 29.03.2016
  साइकिल मेरी बहुत दुखी है। खड़ी हुई दीवार सहारे दुखी नज़र से गेट निहारे बाहर हवा पुकारे उसको पेड़ बुलाएँ सड़क किनारे कैसे मैं उसको समझाऊँ प्यार करूँ मैं गले लगाऊँ साइकिल मेरी बहुत दुखी है पहले वह जाती थी स्कूल डालों पर हँसते थे फूल गलियों-गलियों से परिचिय था अब सब गयी रास्ते भूल घंटों मैं उससे बतियाऊँ हौले उसका सिर सहलाऊँ साइकिल मेरी बहुत दुखी है अँधियारे में छिपी खड़ी है जाने कैसी विकट घड़ी है हवा नहीं है, हिम्मत टूटी उम्मीदों पर धूल पड़ी है क्या कहकर उसको बहलाऊँ कैसे मैं ढाढ़स बंधवाऊँ साइकिल मेरी बहुत दुखी है। - प्रदीप कुमार शुक्ल ( 2021 )
एक चिड़ा था, एक चिड़ी थी उनके मन मे जंग छिड़ी थी उनकी थी जो नन्ही चिड़िया कितनी भोली, कितनी बढ़िया रात हो रही, कब आएगी? सही सलामत आ पाएगी? चिड़िया गाना गाती आई खुल कर हँसी, खूब मुसकाई बोली, मम्मा मत घबराना जंगल सब जाना पहचाना रस्ते सब आसान यहाँ पर नहीं रहें इंसान यहाँ पर - प्रदीप कुमार शुक्ल
गिलहरी और उसके बच्चे एक गिलहरी के थे तीन बच्चे एक था बदमाश, दो बहुत अच्छे बदमाश बच्चे की शिकायत आई पहले तो मम्मी ने की खूब पिटाई फिर प्यार किया, गले से लगाया और बहुत देर तक उसे समझाया मम्मी ने पापा की ड्यूटी लगाई बहनों की नज़रों मे था उनका भाई बहुत दिनों तक रखी गयी नज़र धीरे - धीरे उस का आया असर पास पड़ोस में कहलाते अच्छे अब गिलहरी के तीनों बच्चे - प्रदीप कुमार शुक्ल
कुत्तों से कब तक वह डरती रस्ता देर सबेर का बिल्ली रानी निकल पड़ी हैं पहन हौसला शेर का। - प्रदीप कुमार शुक्ल
दाढ़ी वाले बाबा / प्रदीप शुक्ल मेरी भी तो सुनते जाओ दाढ़ी वाले बाबा एक बरस के बाद आज तुम फिर से पड़े दिखाई पूरे बरस तुम्हारी ढूंढे नहीं मिली परछाई ऐसे कैसे गुम हो जाओ दाढ़ी वाले बाबा आये, रख कर चले गए कुछ टॉफ़ी और खिलौने तुम को ढंग से देख न पाया लम्बे हो या बौने कभी बिना दाढ़ी के आओ दाढ़ी वाले बाबा मुझे दांत में दर्द हो रहा टॉफ़ी कैसे खाऊँ गेंद तुम्हारी लेकर बाहर कहाँ खेलने जाऊँ मुझको तुम लूडो दिलवाओ दाढ़ी वाले बाबा अच्छा अगले साल सुनो तुम जब क्रिसमस में आना मेरे वाले सभी खिलौने बस्ती में पहुँचाना चाहो सब वापस ले जाओ दाढ़ी वाले बाबा. - प्रदीप कुमार शुक्ल
गिलहरी और उसके बच्चे एक गिलहरी के थे तीन बच्चे एक था बदमाश, दो बहुत अच्छे बदमाश बच्चे की शिकायत आई पहले तो मम्मी ने की खूब पिटाई फिर प्यार किया, गले से लगाया और बहुत देर तक उसे समझाया मम्मी ने पापा की ड्यूटी लगाई बहनों की नज़रों मे था उनका भाई बहुत दिनों तक रखी गयी नज़र धीरे - धीरे उस का आया असर पास पड़ोस में कहलाते अच्छे अब गिलहरी के तीनों बच्चे - प्रदीप कुमार शुक्ल
एक चिड़ा था, एक चिड़ी थी उनके मन मे जंग छिड़ी थी उनकी थी जो नन्ही चिड़िया कितनी भोली, कितनी बढ़िया रात हो रही, कब आएगी? सही सलामत आ पाएगी? चिड़िया गाना गाती आई खुल कर हँसी, खूब मुसकाई बोली, मम्मा मत घबराना जंगल सब जाना पहचाना रस्ते सब आसान यहाँ पर नहीं रहें इंसान यहाँ पर - प्रदीप कुमार शुक्ल
धरती का बच्चा नन्हा बीज आलसी था था सबसे छिपकर सोया चंचल बहती हवा, धूप के सपनों मे था खोया नींद खुली, आँखों को मलता जब वह बाहर आया धूल, धुआँ, चिड़चिड़ी हवा को पाकर वह घबराया लगा छींकने, खाँसा फिर बीमार हो गया गोया नन्हा बीज बना जब पौधा बहुत दिनों तक रोया - प्रदीप कुमार शुक्ल
घोड़ा ( बाल कविता ) एक नेता ने ख़रीदा एक घोड़ा गरीब के सिर पर नारियल फोड़ा घोड़ा माल खाता रहा गरीब सिर सहलाता रहा फ़िर घोड़े ने नेता को उछाल कर गिराया एक और नेता को पीठ पर बिठाया अब घोड़ा ख़ुद एक नेता है सारी घास ख़ुद लपक लेता है आजकल मुंबई मे है मेला और घोड़ा नहीं है अकेला। - प्रदीप कुमार शुक्ल
कार्बनडाईऑक्साइड ---------------------- मोती ने आंखें खोलीं तो पाया खुद को घर में दुबका हुआ पड़ा था अपने छोटे से बिस्तर में मम्मी ने बनवा दी उसके खातिर छोटी सदरी तेज हवा थी जाड़ा था, थी आसमान में बदरी दिन भर तो वह उछला कूदा शीलू को दौड़ाया रात हुई तो थर थर कांपा मोती बहुत जड़ाया दादा जी ने तब अलाव के पास उसे बैठाया स्टोर रूम में मोती का फिर बिस्तर स्वयं लगाया देर रात में शीलू ने जब झाँक लिया था स्टोर कमरे में बस गूँज रहा था कूँ कूँ कूँ का शोर शीलू ने देखा दालान में थे अलाव के कोयले सुलग रहे थे उसके अन्दर अभी आग के गोले उसने तसले को खिसकाया और रख दिया स्टोर में बंद कर दिया दरवाजा देखेंगे इसको भोर में कुछ घंटों के बाद अभी थी तीन बजे की बात भैया को थी चाय बनानी पढ़ता सारी रात देखा तो स्टोर में पूरा धुआं भरा था भारी मोती पड़ा हुआ था उस पर बेहोशी थी तारी भैया उसे उठाकर फ़ौरन खुली हवा में आया बहुत देर में तब मोती ने अपना कान हिलाया कोयले ने सारी ऑक्सीजन कमरे की खा डाली कार्बनडाईऑक्साइड बेहोशी देने वाली दादा कहते, शीलू देखो होती है दुर्घटना जलती हुई अंगीठी, कोयला कमरे में ...
लालु ----- उठि जाव लालु उठि जाव लालु द्याखौ आवा है नवा सालु चिरई चिरवा सब खोजि रहे तुमका, तुम परे रजाई मा पढ़ि रहा पहाड़ा जाड़ु अबे ठंडक धरि दिहिसि दहाई मा कोहिरा मा सूरजु अटकि रहा वहु पूछि रहा तुमते सवालु उठि जाव लालु उठि जाव लालु द्याखौ आवा है नवा सालु आंखी ख्वालौ - आंखी ख्वालौ अब सोए ते ना कामु बनी तुमरे दूधे खातिर द्याखौ कूकुर - बिलारि मा रारि ठनी अब जगौ किरनियाँ आय गईं बइठीं सिरहाने छुएं गालु उठि जाव लालु उठि जाव लालु द्याखौ आवा है नवा सालु ई नए साल मा बचुआ तुम बसि राह चलेव सच्चाई की थ्वारा अपने मन ते स्वाचौ अब उमिरि नहीं गभुआई की कोसिस कीन्हेव लल्ला हमार तुम चलेव न सपनेव मा कुचालु उठि जाव लालु उठि जाव लालु द्याखौ आवा है नवा सालु - प्रदीप शुक्ल
उल्लू दादा ----------- उल्लू दादा की देखो आँखें तो बहुत बड़ी इतनी बड़ी कि जैसे लटकीं दो दीवार घड़ी फिर भी देख न पाएं दिन में, मंटू फिर बोला और हँसी में बन्दर ने थोड़ा सा विष घोला सबको बुरा लगा मंटू का यह भौंड़ा अंदाज़ उल्लू दादा ने सोचा कुछ करना होगा आज दादा बोले, “ हीरो तोता पूछो गूगल से कैसे भी हो मैं भी देखूंगा दिन में कल से “ मंटू के जाते ही हीरो बोला, उल्लू दादा! पहले तो यह समझें दिन में होती है क्या बाधा? सोन गिलहरी लैपटॉप लेकर जैसे ही बैठी सारी बात समझ कर उसने गर्दन थोड़ी ऐंठी हीरो भैया दादा की है पुतली बहुत बड़ी तेज रौशनी में भी लेकिन कभी नहीं सिकुड़ी बस इसके कारण ही पलकें हो जाती हैं बंद और देखने का दिन में छिन जाता है आनंद उल्लू दादा सुनकर थोड़ा मंद मंद मुस्काए बोले ' अमेजान ' से कह दो काला चश्मा लाए अगले दिन दुपहर में दादा बोले मंटू आओ और आज के समाचार तुम मुझसे सुनते जाओ पढ़ते हैं अखबार खटाखट दिन में उल्लू दादा लोग कह रहे उल्लू दादा बुद्धिमान हैं ज्यादा ll - प्रदीप शुक्ल
चीची का पनीर ---------------- चीची चूहा और पनीर बात ज़रा सी है गंभीर चीची के चाचा लाए हैं एक कटोरी खीर चीची का मन लगा हुआ है बस पनीर के टुकड़े पर चिंता की रेखाएं उसके खिंची हुई हैं मुखड़े पर दिन भर से पनीर खाने को मनुआ बहुत अधीर मम्मी कहती चीची बेटा खीर रखी है कबसे मुझको तो पनीर खाना है चीची कहता सबसे डोल रहा है आज सुबह से भर अँखियों में नीर चाचा बोले भूख लग रही आजा चीची बेटा और खीर को बस पनीर के चारों तरफ लपेटा बड़े मजे से अभी खा रहा चीची, खीर - पनीर l - प्रदीप शुक्ल
देबू की किताबें ---------------- अलमारी से निकल किताबें बाहर आती हैं देबू के ही साथ बैठकर खाना खाती हैं खाना खत्म हुआ तो पुस्तक हिस्ट्री की बोली देबू तुमको पता आज मैं घंटे भर सो ली सोती हूँ मैं जब तक मम्मी नहीं उठाती हैं चित्रकला की पुस्तक ने कुछ ऐसे रंग बिखेरे किरनें आकर बैठ गईं बिस्तर पर खूब सबेरे और बैठकर परियों वाली कथा सुनाती हैं देबू को जो सबसे प्यारी पुस्तक है विज्ञान की छुपी हुई है आज रूठ कर ओट लिए सामान की देबू का मुँह देख किताबें भी मुस्काती है - प्रदीप शुक्ल