!! लो फिर शरद ऋतु आ गयी !! धूप की गरमी में नरमी आ गयी लो फिर शरद ऋतु आ गयी !! उसके आने का , इशारा हो गया चढ़ता हुआ पारा , अचानक खो गया एक ठंडी सी छुअन अब , सांझ के माथे पे है गुनगुनी सी धूप लेकर , फिर सवेरा हो गया और हलकी धुंध सी फिर छा गयी लो फिर शरद ऋतु आ गयी !! तेरे आते ही गुलों के , रंग सब गहरा गये भौंरे फूलों से लिपट कर , कान में कुछ गा गये ओस की बूँदें चमक उट्ठीं , ज़रा सी धूप से मोतियों के कीमती टुकड़े , धरा पर छा गये देर से निकला है सूरज , सुबह भी अलसा गयी लो फिर शरद ऋतु आ गयी !! ये गुलाबी ठंड का मौसम , अभी जाने को है कंपकंपाती ठंड का मौसम , अभी आने को है ये हवा जो लग रही , ठंडी छुअन सी कुछ दिनों के बाद , चुभ जाने को है भोर की ठंडी हवा बतला गयी लो फिर शरद ऋतु आ गयी !! कडकडाती ठंड से हम तो बचेंगे पर न जाने लोग फिर कितने मरेंगे नहीं सबके पास बेहतर आशियाना किसी के पास तो फिर वही कम्बल पुराना ठंड आई दिल में दहशत छा गयी लो फिर शरद ऋतु आ गयी !! अच्छा नहीं है इस तरह कविता मोड़ देना और सुन्दर कल्पनाओं को तोड़ देना कैसे कहूं सब शरद का आनंद लेंगे जब मुझे मालूम , कुछ लोग मरणा...
जो सपने हों, सब अपने हों, सपनों का मर जाना कैसा मन की बातें, चाहे तो आप कविता - कहानी, गद्य - पद्य भी कह सकते हैं.