Skip to main content

Posts

पियरी पहिरे सहर मा, गोरी रहीं लजाय हुआं बसंता ख्यात मा, बइठे अबे जड़ाय ll
चीची का सपना ----------------- लेट गया था चूहा चीची लेटे लेटे आँखें मीचीं लगा देखने सुन्दर सपना सब कुछ समझ रहा था अपना देखा वह लड़ गया चुनाव उसके पीछे सारा गांव सब चूहों का है वह मुखिया उसने ताज पहन ही लिया लगा हुआ है अब दरबार बस चूहों की है भरमार वही कहानी बिल्ली वाली कौन करे उससे रखवाली कोई घंटी बाँध न पाए कुछ वीरों ने प्राण गंवाए चीची बोला, सारे सुनो बात हमारी मन से गुनो अब आया है नया ज़माना घंटी किस्सा हुआ पुराना हम सब मोबाइल रक्खेंगे बिल्ली की लोकेशन देंगे देखो होगी ड्यूटी जिसकी जिम्मेदारी होगी उसकी उसको ही नेटपैक मिलेगा लेकिन एफ बी नहीं चलेगा वाट्स ऐप पर है पाबंदी लत हर हालत में है गंदी तभी मच गई चिल्लम चिल्ली देखा चली आ रही बिल्ली चीची तुरत नींद से जागा और उछल कर फ़ौरन भागा. - प्रदीप शुक्ल
एक नन्हे सितारे की कहानी ----------------------------- बहुत दूर नीले अम्बर में था जो एक सितारा अपने पूरे कुनबे में था सबसे ज्यादा प्यारा छोटा था पर बहुत तेज था चमक दूर तक जाती अपने कुनबे के मुखिया का वह तारा था नाती तभी एक दिन मुखिया ने खुश होकर उसे पुकारा जाओ बच्चे जीवन का यह बीज लिए तुम जाओ तुम काबिल हो अपना सुन्दर सा संसार बनाओ सूरज नाम रखा उसका गोदी में ले पुचकारा बहुत दूर चलकर सूरज ने डाला अपना डेरा एक बनाया अपने मन का खूब बड़ा सा घेरा और उसी घेरे में फिर जीवन का बीज उतारा उसी बीज से पैदा हम सब पृथ्वी कि संतानें इसीलिए सूरज दादा को अपना सबकुछ मानें ख़त्म कहानी, सो जाओ अम्मा ने किया इशारा - प्रदीप शुक्ल
धूप से चुगली -------------- जाते जाते सर्दी बोली धूप बहन तुम आओ हमको जमकर कोस रहे जो उनको मजा चखाओ पहले तो हमको बोला था आओ आओ आओ अब समवेत स्वरों में कहते जाओ जाओ जाओ अभी कह रहे आओ बैठो खेलो धूप कुमारी कुछ दिन में भागेंगे जैसे सूरत दिखे तुम्हारी अच्छा ख़ासा नर्म गुलाबी मौसम मैं लाई थी लोगों के सौ ताने सुनकर मैं तो चकराई थी जाते हुए भयंकर ठंडक मैंने भी फैलाई थर थर कांप रहे हैं सारे ओढ़े कई रजाई धूप बहन सब अभी तुम्हारे साथ करें याराना याद रखो लेकिन तुमको पड़ जाएगा पछताना मैं तो चली बहन छुट्टी पर इनको तुम्ही सँभालो मुझे भगाया इन लोगों ने तुम भी इन्हें उबालो. - प्रदीप शुक्ल 27.01.2016 ( रिपोस्ट )
ओ बसंत ! रेशम रेशम छुअन प्यार की ला पाओ तो लाना हो पाए तो मुझे छोड़ कर वापस फिर मत जाना मुझको तेरा इंतज़ार है, आना ! ओ बसंत ! तुम आना
अरे बसंता! ----------- अरे बसंता कहाँ परे हौ हियाँ ख्यात मा पाँव पसारे द्याखौ टीबी, बजटु आ रहा वहिका पकरौ हुएं दुआरे पियरी पहिने बईठि म्याड़ पर कहौ कि फोटू होईगै बिटिया अम्मा यादि कै रहीं तुमका आव घरै लागी हैं खटिया जाव बजारै, लाव दवाई कामु बनी ना खीस बघारे सुनौ बसंता कहौ आम ते चाहे जेतना वहु बौराए उनके कान प जुआँ न रेंगी जउन बईठ हैं बजट बनाए गुठली मिली तो वहिका चूसेव समझेव भईया राम पियारे कहौ हवा ते बहुतु न उछरौ आवति होई बिकासु क जंगल कालिख पोती तुम्हरे मुँह मा होई रोजु हियाँ पर दंगल जाव बसंता हुएं सहर मा हियाँ न घूमौ मारे मारे - प्रदीप शुक्ल ( अवधी नवगीत संग्रह ' यहै बतकही है ' से )
मिट्ठू और मिंकू ---------------- राम चरित मानस पढ़ता था दिन में मिट्ठू तोता लेकिन सुबक सुबक कर मिट्ठू रात रात भर रोता मिंकू विद्यालय से लौटा खेल रहा फ़ुटबाल मिट्ठू की पिंजरे में केवल तीन कदम की चाल मिंकू दौड़े खेतों में मिट्ठू पिंजरे में होता मिट्ठू के बचपन का साथी बैठा हुआ मुंडेर रहा देखता मिट्ठू उसको जाने कितनी देर रोज रात को सपने में मिट्ठू पेड़ों पर सोता और एक दिन मिट्ठू जब बैठा था बहुत उदास मिंकू को उसके दुक्खों का हुआ तभी अहसास पिंजरा खुला लगाए मिट्ठू अब खुशियों का गोता - प्रदीप शुक्ल
फागुन - फागुन ढोल मँजीरा झाँझरी, ढपली और मृदंग धूल झाड़ कर आ गए, सब फागुन के संग पीली चूनर ओढ़ कर, सरसों खड़ी सिवान नटखट फागुन दूर से, कर लेता पहचान आहट फागुन की सुनी, बौराया है आम पत्ते पत्ते हँस पड़े, फैली खबर तमाम गागर रंगों से भरी, जिसने दिया उछाल उस फागुन के हाथ में, महका हुआ गुलाल महका महका तन लिए, मनुआ फिरे अधीर फागुन फागुन हो रही, पुरवा की तासीर. - प्रदीप शुक्ल
फरेंदा : एक याद --------------------- पेड़ों के झुरमुट से निहुर कर जहां पर लम्बवत सूरज की किरणें धरती को चूम रही हैं, ठीक उसी जगह पर एक विशाल जामुन का पेड़ हुआ करता था l दरअसल जामुन का नहीं वह फरेंदा का पेड़ था l गंवई बातचीत में जामुन का मतलब कठ्जमुनी से होता जो स्वाद में और आकार में फरेंद से काफी निचले पायदान पर रखी जाती थी l उम्र रही होगी यही चौदह - पंद्रह l हम दो जने ठीक दोपहर में करीब पंद्रह फीट ऊंची इसकी एक मोटी सी डाल पर खड़े हो उचक उचक कर रसीले फरेंद साथ लिए कपड़े की झोली में रख रहे थे l अचानक कुछ टूटने की आवाज़ आई और अगले पल हम दोनों डाल सहित धूल चाट रहे थे l जो सबसे पहले दो बातें दिमाग में तुरंत आईं वह थीं पिताजी का तमतमाया चेहरा और फरेंद की झोली l झोली में रखे फरेंदों ने एक बड़ी सी मॉडर्न आर्ट, गन्दगी और धूल से पीली हुई बनियान पर बड़े सुरुचि पूर्ण तरीके से छाप दी थी l गहरा जामुनी रँग बनियान को बेधता हुआ पेट और सीने पर भी शोभायमान था l दोनों कुहनियों और एक घुटने पर लाल रँग के धब्बे धूल द्वारा लगभल कैमोफ़्लाज हो गए थे l घर जाते समय थोड़ी देर लंगडा कर चलने के बाद चाल फिर से मृग...
लखनऊ की साहित्यिक हवाओं में इन दिनों नए रंग घुल रहे हैं। इसे आने वाले बसंत की रंगबाजी नहीं समझना चाहिए बल्कि यह रंगरेजी मिज़ाज कुछ उभरते हुए शब्दकारों का पैदा कि या हुआ है। ये एकांतवासी रंगरेज साहित्यिक गहमागहमी से दूर साहित्य की अनेक विधाओं के नव्य रूपाकार गढ़ रहे हैं, उनमें चटक रंग भर रहे हैं। नए रूप रंग के ये शब्दचित्र बेबस ही आमंत्रित करते हैं कि आओ मुझे पढ़ो, मेरी जीवंतता को महसूस करो। इनमें जीवन का सौंदर्य है, ठसक है, वंचना की पीड़ा है, कसक है।इनमें से एक रंगरेज हैं मेरे प्रिय मित्र  प्रदीप शुक्ल । पेशे से स्वर्ण पदक प्राप्त बाल चिकित्सक हैं। व्यक्तिव में ”भवन्ति नम्रस्तरव: फलौद्गमै:” ‘(फल आने पर द्रुम स्वत: ही झुक जाते हैं) वाली नम्रता जैसे घुट्टी में मिली हो। उनसे बात करने का समय नियत है, दोपहर 1-30 से 3-00 बजे तक, जब उनकी ओ पी डी का इंटरवल होता है। शेष समय वे नन्हें-मुन्नों के बीच आला लगाये नवजातों की धड़कनों और मुस्कुराहटों में कवितायें ढूंढते रहते हैं। बमुश्किल दो वर्ष पूर्व उन्हें कविताई का चस्का लगा। इस दो वर्ष में उन्होने एक से एक गीत-नवगीत, मुकरियाँ, कुंडलियाँ, दोहे अवध...
छिनु छिनु लौटि लौटि आ जाय, अउतै देहीं मा लपिट्याय, भलकुछु वहिका आंखी काढ़ा को सखि, सजना? नाहीं, ' जाड़ा '
श्रीमान राजेन्द्र यादव जी ( हंस वाले नहीं ) ने तकरीबन डेढ़ दशक पहले स्टार्ट अप इंडिया के तहत व्यवसाय शुरू किया था l " हर बीमारी ( इलाज ) दस रुपये में " आरम्भ करने वाले राजेन्द्र ने पंद्रह बरस पश्चात भी दाम नहीं बढाए l ( यह ठीक उसी तर्ज पर है जैसे श्रीमान लालू यादव जी ने रेलवे के साथ किया था l श्रीमान राजेन्द्र जी को भी हार्वर्ड में व्याख्यान के लिए बुलाने पर विचार किया जा रहा है l ) वैश्विक आर्थिक मंदी, इन्फ्लेशन और महंगाई को धता बताते हुए सर्विस सेक्टर में उत्तरोत्तर प्रगति का यह एक सर्वथा अनूठा उदाहरण है l सर्विस सेक्टर की इस विशेष चिकित्सा शाखा का विकास आश्चर्यचकित कर देने वाला है l हमारे यशस्वी प्रधानमन्त्री ने संज्ञान लेते हुए सरकार को निर्देशित किया है कि ब्रिज कोर्स के द्वारा इस शाखा का तुरंत विकास किया जाय l हम पूरे विश्व के सामने हम इस मॉडल को जल्द से जल्द प्रदर्शित करने वाले हैं l
नहीं रहे हमारे एलकेजी ( डॉ. लक्ष्मी कांत गुप्ता 1989 बैच KGMU, LKO ) सरल ह्रदय मृदुभाषी हरदम रहे हमारे एलकेजी यारों की हँस कर चिकोटियाँ सहे हमारे एलकेजी जैसे शांत नदी बहती है शहरों के कोलाहल में वैसे ही निर्मल धारा से बहे हमारे एलकेजी याद आ रहे कितने किस्से होली वाले टीजी में खूब लगाते जोर जोर कहकहे हमारे एलकेजी इतनी जल्दी कौन भला गायब होता इस दुनिया से कैसे कह दूं यार नहीं अब रहे हमारे एलकेजी - प्रदीप शुक्ल
टिन्नी टिन्नी के पापा टिन्नी को खूब खूब समझाएं अंग्रेजी, विज्ञान, गणित की पुस्तक रोज पढ़ाएं टिन्नी कहती, पापा मुझको कला बहुत है भाती पल भर में ही कितने सारे सुन्दर चित्र बनाती पापा कहते अच्छा है, पर अभी पढ़ो विज्ञान मन मसोस कर रह जाती है नन्ही सी वह जान जैसे तैसे पास किया उसने अपना स्कूल अब विज्ञान गणित विषयों को जाना चाहे भूल पापा चाहें इंजीनियरिंग कॉलेज पढ़ने जाए टिन्नी को पर फाइन आर्ट्स का कॉलेज ही ललचाये इसी बात पर टिन्नी के घर होती रोज लड़ाई छोटी सी यह बात मगर पापा को समझ न आई इंजीनियरिंग कॉलेज में टिन्नी अब दिन भर रोती पापा से भी बातचीत टिन्नी की कम ही होती फेल हो गई टिन्नी अब तो मन ही मन घबराए तभी एक दिन पापा उसके कॉलेज चलकर आए हाल देखकर टिन्नी का अब दुखी हुए हैं पापा डांट पड़ेगी खूब सोचकर टिन्नी का मन कांपा पर पापा ने बहुत प्यार से उसको गले लगाया और उसी क्षण कॉलेज से बस उसका नाम कटाया अब जो भी मन होगा उसका टिन्नी वही पढ़ेगी अपने मन चाहे रंगों की दुनिया खूब गढ़ेगी ll - प्रदीप शुक्ल
फ़रवरी में गुल्लू ----------------- जल्दी जगने लगे आजकल दिन गुल्लू के गाँव में और दोपहर में सुस्ताने लगे नीम की छाँव में बाहर निकल किताबें अब तो झांक रही हैं झोले से गुल्लू भैया जान बूझ कर बने हुए हैं भोले से डर है चित ना हो जाएं वह इम्तेहान के दाँव में मैच आ रहा है टीवी पर मन उसमे ही डोल रहा खुला हुआ पन्ना हिस्ट्री का गुल्लू से कुछ बोल रहा तारीखें सब युद्ध कर रही हैं अब मारे ताव में सोते ही बजने लगती है रोज घड़ी की घंटी सर के ऊपर तनी हुई है इम्तेहान की संटी बेड पर गुल्लू बाबू बैठे कम्बल डाले पाँव में - प्रदीप शुक्ल
वहु आवै तो चम्पा फूलै जियरा जाड़ा गरमी भूलै बहका बहका घूमि रहा मनु का सखि साजनु? नाहीं ' फागुनु ' हमरे साथ किहिसि वहु ध्वाखा अब रहिगा वहु खाली ख्वाखा मरै सार कहुं जाय मतलबी सखी पिरेमी? ना, ' पीएनबी ' लगता था वह अब न आएगा हमको शायद भूल जाएगा पर वह कहां सुधरने वाला? क्या सखि प्रेमी? न, ' घोटाला ' कुरता पहिने तिलक लगाए हम बैठे थे कुछ घबराए अचकन भगवा रँग में रंगी क्या सखि साजन? ना, ' बजरंगी ' उसकी ये नयनों की भाषा, सरे आम हो गया तमाशा चर्चा पहुँच गई आकाश l क्या सखि साजन? प्रिया प्रकाश
जब भी जी चाहे सफ़र पर रहिये और फिर लौट अपने घर रहिये जिंदगी जहां तक हो रखिये आसां कभी झुक जाइए, कभी सर रहिये जब भी बाहर बड़ा बवंडर हो अपने अन्दर ही बस उतर रहिये देश मे घी खाईये उधारी पर मूंछ फिर ऐंठ कर बाहर रहिये हर समय गोल मोल ठीक नहीं बात कहने में बस निडर रहिये - प्रदीप शुक्ल
अवधी हमारि - अवधी हमारि ------------------------------ अवधी हमारि - अवधी हमारि, हमका सबते जादा पियारि ई धरती पर आंखी ख्वाला तब हमका तुम कउरियाय लिहेव सोहर गाएव बन्ना सुनाएव जब रोयेन, हमका बेल्ह्माय दिहेव बचपन मा अम्मा का दुलारु तुम अबहूँ तक रक्खेव संभारि अबहूँ बाबा का यादि करी हम मानस की चौपाई ते सपने मा अवधी बोलिति है अबहूँ हम भईंसी गाई ते मौक़ा मिलतै अंगरेजी कै धरि देइति हम केंचुल उतारि अब बहुत दिनन ते सुनेन नहीं तुमरी मीठी मीठी गारी वहु किस्सौ कोउ सुनावै ना जब रमई काका गे ससुरारी बोले कहे रहौ घर मा नाहीं, बचुआ देहैं बिसारि - प्रदीप शुक्ल
होरी मा दून्हो जने, बेमतलब चिल्लायँ ख़ास बिरावैं दूरि ते, आम हियाँ बौरायँ बहियाँ गहे बसंत की,  फागुन आया द्वार  अब बूढ़े हेमंत ने, वर्दी धरी उतार l बहियाँ गहे बसंत की, फागुन आया द्वार अब बूढ़े हेमंत ने, वर्दी धरी उतार l
# किस्सा_किस्सा_लोककथाएं #1 शेषनाग पर लेटे हुए विष्णु भगवान लक्ष्मी जी से बतिया रहे थे। दीवाली का भोर था सो लक्ष्मी जी काफी थकी हुई लग रही थीं, परंतु अंदर से प्रसन्न भी। लक्ष्मी जी ने मुस्कुरा कर कहा, ' हे देव, कल देखा आपने, नीचे मृत्युलोक में कितना लोग मुझे चाहते हैं। विष्णु भगवान कुछ अनमने से दिखे। बोले, देखिये लक्ष्मी जी, दीवाली के दिन तो बात ठीक है, लोग आपकी पूजा करते हैं, आपका स्वागत करते हैं, बाकी के दिनों में भगवान, भगवान होता है। हो सकता है कि कुछ दरिद्र और  अशिक्षित लोग आप की आकांक्षा रखते हो आपका स्वागत करते हों और आप को बड़ा मानते हो, परंतु शिक्षित वर्ग और योग्य लोग भगवान को लक्ष्मी से ऊपर रखते हैं। लक्ष्मी जी ने मुस्कुरा कर कहा नाथ, ऐसा नहीं है। बाकी दिनों में भी मृत्यलोक के प्राणी मुझे ही ज्यादा पसंद करते हैं। और पढ़े-लिखे योग्य लोगों की तो आप बात ही मत करिए। बात विष्णु भगवान को खल गई। बोले, " प्रिये, आइए चलते हैं इस बात की परीक्षा ले ली जाए। हालांकि लक्ष्मी जी दीवाली में थक कर चूर हो चुकी थीं पर यह मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहतीं थीं। देवलोक से भूलोक...
नफ़रती नीम अँधेरों पे ताले रखिये दिल में भरपूर मोहब्बत के उजाले रखिये ख़ुदा को बन्दग़ी, ईश्वर को पूजिये लेकिन अपने अंदर के इंसान को पाले रखिये रिश्तों के कीट - पतंगे सभी फँस जाएँ बस फँसाने के लिए मोह के जाले रखिये माँ ने रक्खी थी जहाँ रोज़ जलाकर ढिबरी मन मे महफ़ूज़ वो दालान के आले रखिए कभी जिस बात से तुम बाद मे शर्मिंदा हो जहां तक हो सके उस बात को टाले रखिए जिंदगी के मंच पर सब लोग करतब कर रहे बस किसी नट की तरह गेंद उछाले रखिये खुला बाज़ार है, बाज़ार में सब बिकता है हो सके मुमकिन तो ईमान सँभाले रखिये प्रदीप कुमार शुक्ल