फरेंदा : एक याद
---------------------
---------------------
पेड़ों के झुरमुट से निहुर कर जहां पर लम्बवत सूरज की किरणें धरती को चूम रही हैं, ठीक उसी जगह पर एक विशाल जामुन का पेड़ हुआ करता था l दरअसल जामुन का नहीं वह फरेंदा का पेड़ था l
गंवई बातचीत में जामुन का मतलब कठ्जमुनी से होता जो स्वाद में और आकार में फरेंद से काफी निचले पायदान पर रखी जाती थी l
उम्र रही होगी यही चौदह - पंद्रह l हम दो जने ठीक दोपहर में करीब पंद्रह फीट ऊंची इसकी एक मोटी सी डाल पर खड़े हो उचक उचक कर रसीले फरेंद साथ लिए कपड़े की झोली में रख रहे थे l अचानक कुछ टूटने की आवाज़ आई और अगले पल हम दोनों डाल सहित धूल चाट रहे थे l
जो सबसे पहले दो बातें दिमाग में तुरंत आईं वह थीं पिताजी का तमतमाया चेहरा और फरेंद की झोली l झोली में रखे फरेंदों ने एक बड़ी सी मॉडर्न आर्ट, गन्दगी और धूल से पीली हुई बनियान पर बड़े सुरुचि पूर्ण तरीके से छाप दी थी l गहरा जामुनी रँग बनियान को बेधता हुआ पेट और सीने पर भी शोभायमान था l दोनों कुहनियों और एक घुटने पर लाल रँग के धब्बे धूल द्वारा लगभल कैमोफ़्लाज हो गए थे l
घर जाते समय थोड़ी देर लंगडा कर चलने के बाद चाल फिर से मृगछौने जैसी हो गई थी l हाँ, जीभ के स्वाद तंतु और आमाशय में रिस आये एन्जाइम्स को समझाने के लिए काफी मसक्कत करनी पड़ी l फुनगी पर गुच्छों में लगे काले - नीले फरेंदे स्थिति को सामान्य होने में थोड़ा मुश्किल पैदा कर रहे थे l
घर जाते समय थोड़ी देर लंगडा कर चलने के बाद चाल फिर से मृगछौने जैसी हो गई थी l हाँ, जीभ के स्वाद तंतु और आमाशय में रिस आये एन्जाइम्स को समझाने के लिए काफी मसक्कत करनी पड़ी l फुनगी पर गुच्छों में लगे काले - नीले फरेंदे स्थिति को सामान्य होने में थोड़ा मुश्किल पैदा कर रहे थे l
Comments
Post a Comment