लखनऊ की साहित्यिक हवाओं में इन दिनों नए रंग घुल रहे हैं। इसे आने वाले बसंत की रंगबाजी नहीं समझना चाहिए बल्कि यह रंगरेजी मिज़ाज कुछ उभरते हुए शब्दकारों का पैदा किया हुआ है। ये एकांतवासी रंगरेज साहित्यिक गहमागहमी से दूर साहित्य की अनेक विधाओं के नव्य रूपाकार गढ़ रहे हैं, उनमें चटक रंग भर रहे हैं। नए रूप रंग के ये शब्दचित्र बेबस ही आमंत्रित करते हैं कि आओ मुझे पढ़ो, मेरी जीवंतता को महसूस करो। इनमें जीवन का सौंदर्य है, ठसक है, वंचना की पीड़ा है, कसक है।इनमें से एक रंगरेज हैं मेरे प्रिय मित्र प्रदीप शुक्ल। पेशे से स्वर्ण पदक प्राप्त बाल चिकित्सक हैं। व्यक्तिव में ”भवन्ति नम्रस्तरव: फलौद्गमै:” ‘(फल आने पर द्रुम स्वत: ही झुक जाते हैं) वाली नम्रता जैसे घुट्टी में मिली हो। उनसे बात करने का समय नियत है, दोपहर 1-30 से 3-00 बजे तक, जब उनकी ओ पी डी का इंटरवल होता है। शेष समय वे नन्हें-मुन्नों के बीच आला लगाये नवजातों की धड़कनों और मुस्कुराहटों में कवितायें ढूंढते रहते हैं। बमुश्किल दो वर्ष पूर्व उन्हें कविताई का चस्का लगा। इस दो वर्ष में उन्होने एक से एक गीत-नवगीत, मुकरियाँ, कुंडलियाँ, दोहे अवधी नवगीत लिख डाले। रचनाएँ ऐसी कि देश देशांतर उनकी सराहना हुई, सम्मानित हुए। मेरे पसंदीदा शायर मरहूम शहरयार कहते हैं-
ये जगह हैरतपना है तुझसे ये किसने कहा
यूं ही आ निकला था मैं तो सफर करने के लिए।
यूं ही आ निकला था मैं तो सफर करने के लिए।
सचमुच वे साहित्य में बस घुमक्कड़ी करते हुए ही आए। कविता उनके लिए हैरतपने की चीज़ नहीं है। रोज़मर्रा ज़िंदगी में बिखरे विषयों को वे आमफहम भाषा का इस्तेमाल कर सीधे सीधे पाठकों तक पहुंचा देते हैं। इसमें उनका साथी होता है, टेबिल पर रखा कम्प्युटर और नेट। वे नोटबुक और पेन का सहारा नहीं लेते। कारण समय की कमी। उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ से गीत-नवगीत का उनका चर्चित संग्रह ‘”अम्मा रहती गाँव में’ आ चुका है। अवधी नवगीत संग्रह ‘यहै बतकही है” और “बालगीत संग्रह ‘”कहो चिरैया’ प्रकाशनाधीन है। उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ से सद्य: प्रकाशित बालगीत संग्रह ‘”’गुल्लू का गाँव”” हरिकृष्ण देवसरे बालसाहित्य न्यास से उनको और पंकज चतुर्वेदी को संयुक्त पुरस्कार प्राप्त कर चुका है। यह सम्मान उन्हें दिल्ली में आयोजित डॉ हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य न्यास के आयोजन में दिया जाना था, पर यह सुख लखनऊ को प्राप्त हुआ। किसी भी किस्म की मुंहदिखाई से परहेज करने वाले भाई ने न तो किसी अखबार को न्योता दिया, न ही लखनऊ में फैले अपने प्रशंसकों को ही इसकी कानों कान खबर होने दी। बस बुला लिया ज़िगरी यारों को और खानपूरी कर डाली। इस आयोजन के सुखद क्षणों में न्यास की ओर से शिप्रा देवसरे, उनके परिवार के सदस्य, न्यास के गठन से ही न्यास के अंग रहे बाल साहित्य के मर्मज्ञ सुरेन्द्र विक्रम, डॉ0 हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार प्राप्त बाल साहित्यकार और http://me.scientificworld.in के संचालक डॉ ज़ाकिर अली रजनीश तथा बखेड़ापुर के उपन्यासकार, चर्चित कथाकार और मंतव्य के संपादक हरे प्रकाश उपाध्याय, उत्तरायण के प्रकाशक, संपादक Nirmal Shukla, श्रेष्ठ नवगीतकार Sheelendra Chauhan तथा डॉ प्रदीप शुक्ल के पिता जी, उनके साहित्यप्रेमी भाई संदीप शुक्ल सहभागी रहे।
आयोजन में बीज वक्तव्य देते हुए न्यास की ओर से शिप्रा देवसरे ने बाल साहित्य के सृजन, संवर्धन के प्रति डॉ0 हरिकृष्ण देवसरे द्वारा किए गए अथक प्रयासों और न्यास के गठन की पूर्व पीठिका का उल्लेख किया, सुरेन्द्र विक्रम ने डॉ0 देवसरे के साथ बिताए गए प्रसंगों को सुनाकर बाल साहित्य की प्रासंगिकता, उपादेयता का लेखा जोखा प्रस्तुत किया। हरे भाई ने अपने चिर परिचित तेवर में इस बात पर ज़ोर दिया कि बाल लेखन अब सिर्फ फूल-तितलियों-परियों-राजा रानी या काल्पनिक फनतासियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आज की सामाजिकता के अनुरूप नयी गढ़न की आवश्यकता है। यह भी कि बाललेखन अपेक्षाकृत अधिक कठिन है क्योंकि आप यहां विमर्शलेखन नहीं कर सकते, बडे होकर भी बच्चा बनकर लिखना है। डा0 ज़ाकिर अली रजनीश ने बाल लेखन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर अपनी बात रखी। उन्होने दादी नानी की भूत-प्रेत, कपोल कल्पित विषयवस्तुओं की जगह जागरूक और तर्कसम्मत लेखन पर एक सारगर्भित वक्तव्य दिया।
डॉ0 प्रदीप शुक्ल की ‘”गुल्लू के गाँव” के गीतों-कविताओं की प्रस्तुति ने बाल संसार के अनछुए संस्मरणों से परिचित कराया। लखनऊ में आयोजन हो और समोसे-मिठाई न हो ऐसा संभव नहीं, इसलिए इसका जिक्र करना जरूरी है। बधाई भाई प्रदीप शुक्ल जी को और न्यास को भी। आखिरकार बाल लेखन का सर्वोच्च पुरस्कार लखनऊ दूसरी बार जो आया है। और हाँ! बहुत दिनों बाद मैंने कैमरे पर भी हाथ आजमाये। आप भी नयनसुख लीजिये। गुल्लू से गपशप और आपकी मुलाक़ात फिर कभी।
Comments
Post a Comment