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नहीं रहे हमारे एलकेजी ( डॉ. लक्ष्मी कांत गुप्ता 1989 बैच KGMU, LKO )
सरल ह्रदय मृदुभाषी हरदम
रहे हमारे एलकेजी
यारों की हँस कर चिकोटियाँ
सहे हमारे एलकेजी
जैसे शांत नदी बहती है
शहरों के कोलाहल में
वैसे ही निर्मल धारा से
बहे हमारे एलकेजी
याद आ रहे कितने किस्से
होली वाले टीजी में
खूब लगाते जोर जोर कहकहे
हमारे एलकेजी
इतनी जल्दी कौन भला
गायब होता इस दुनिया से
कैसे कह दूं यार
नहीं अब रहे हमारे एलकेजी
- प्रदीप शुक्ल

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