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1962 : हार की जीत
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आज से ठीक सत्तावन बरस पहले 21 नवम्बर, 1962 को चीन ने हमारी नाक जमीन पर रगड़ कर एकतरफ़ा युद्ध विराम की घोषणा कर दी थी l जाहिर है आज का दिन हमारे लिए कोई गौरवशाली दिन तो है नहीं l हमारे लिए यह इतिहास का काला दिन है, एक भुला देने वाली तारीख l
एक महीने चले इस युद्ध में चीन ने हमें धूल और बर्फ दोनों चटाई l हम वीरता से लड़े और बुरी तरह हारे, लेकिन क्या हम 1962 की लड़ाई को सिर्फ़ चीन की जीत और भारत की हार के रूप में ही याद करते रहेंगे?
किंग्स कॉलेज, लन्दन की इतिहास की प्रोफ़ेसर बी जी रिचर्ड इस युद्ध के दूसरे आयाम पर बात करती हैं l वो कहती हैं कि जब नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी " NEFA " ( आज का अरुणाचल प्रदेश ) से सारे भारतीय अधिकारी और कर्मचारी अपने अपने ऑफिस छोड़ कर भाग गए, तब वहाँ की जनता को भय था कि चीन की सेना उनके साथ न जाने क्या क्या करेगी?
अब युद्ध विराम के बाद भारतीय अधिकारी भी वापस आने में बहुत भयभीत थे कि न जाने वहाँ की स्थानीय जनता का व्यवहार उनके साथ कैसा होगा ? पता चला कि चीन की सेना के जवानों ने उस दौरान किसी भी नागरिक से बदसलूकी नहीं की, किसी एक भी लड़की का बलात्कार या शारीरिक शोषण नहीं किया, उनके किसी एक घर को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया l जाते समय वो उन्हें गिफ्ट भी देकर गए और यह वादा भी कि, " जब भी आप मुझे बुलाएंगे तो हम वापस आकार इंडिया को खदेड़ देंगे और आपको आजाद करा देंगे "
फिर ऐसा क्या हुआ कि वहाँ की जनता ने एक विजयी देश को न चुनकर हारे हुए देश के साथ रहना स्वीकार किया? रिचर्ड कहती हैं कि दरअसल चीन का शक्ति प्रदर्शन ही उसके लिए उलटा पड़ा l जनता ने सोचा कि भारत भले ही कमजोर हो पर उनके नागरिक अधिकार चीन की अपेक्षा भारत में ज्यादा सुरक्षित हैं l चीन की आक्रामकता आम नागरिकों को रास नहीं आई l "
1962 के युद्ध में चीन ने अक्साई चीन के निर्जन भू - भाग पर भले ही कब्जा कर लिया हो पर अरुणाचल की आम जनता के दिलों पर भारत का राज कायम रहा l
- प्रदीप कुमार शुक्ल
( फ़ेसबुक ने याद दिलाया तो हमें याद आया )

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