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आया बसंत / डॉ प्रदीप शुक्ल जा रहा जाड़ा पर गर्मी नहीं आई मौक़ा पा फूलों ने ली है अंगड़ाई घबराए बैठे थे जाड़े में अब तक ठंडी हवाओं की मार सहें कब तक पेड़ों ने पत्तों की फेंक दी रजाई सूरज ने खोली हैं थोड़ी सी आँखें हरे हरे घूँघट से कलियाँ सब झाँकें स्वागत में भौरों ने छेड़ी शहनाई तितलियाँ झूल रहीं हवा के हिंडोले मौसम ने यहाँ वहाँ चटख रंग घोले आया बसंत! देखो, धरती मुस्काई. डॉ. प्रदीप शुक्ल
सन्नो कय थैली हेराय गै मन्नो वहि का पाइनि मन्नो समझिनि रुपिया होइहैं धीरे ते मुसकाइनि अइसी वइसी देखि - दाखि कय झउआ तरे छुपाइनि सन्नो वहिमा खाली फीता धरे रहीं गुड़ियाइनि अवधी भावानुवाद : प्रदीप कुमार शुक्ल Lucy Locket Lucy Locket lost her pocket, Kitty Fisher found it; Not a penny was there in it, Only ribbon round it.
राजनीति का खेल है, खेलों का सिरमौर घोड़ी चढ़ता और है, फेरे लेता और फेरे लेता और, साथ मे है सहबाला पाँच बजे ही भोर, पड़ गयी है वरमाला वर-सहबाला बीच, नहीं संबंध प्रीति का ये है सच्चा खेल, खेल है राजनीति का
जामा पहिरे मौर धाराए जल्दी ते घोड़ी चढ़ि आए मुला बराती काढ़ें खीस को सखि, साजन? न, ' फणनवीस ' मड़ए पर ते उठि- उठि भागैं भलि-भलि बात ततैया लागैं अब ब्यांचौ तुम चना चबेना का सखि दुलहा? ना, शिवसेना - प्रदीप कुमार शुक्ल
सत्ता हमने सौंप दी, बटमारों के हाथ फिर-फिर देते हैं उन्ही, अय्यारों का साथ अय्यारों का साथ, हमारे मन को भाया लोकतन्त्र को रोज़, ताश का खेल बनाया राजनीति के चतुर, फेंटते हैं बस पत्ता हमको जोकर बना, भोगते हैं सब सत्ता। - प्रदीप कुमार शुक्ल
एक चिड़ा था, एक चिड़ी थी उनके मन मे जंग छिड़ी थी उनकी थी जो नन्ही चिड़िया कितनी भोली, कितनी बढ़िया रात हो रही, कब आएगी? सही सलामत आ पाएगी? चिड़िया गाना गाती आई खुल कर हँसी, खूब मुसकाई बोली, मम्मा मत घबराना जंगल सब जाना पहचाना रस्ते सब आसान यहाँ पर नहीं रहें इंसान यहाँ पर - प्रदीप कुमार शुक्ल
गिलहरी और उसके बच्चे एक गिलहरी के थे तीन बच्चे एक था बदमाश, दो बहुत अच्छे बदमाश बच्चे की शिकायत आई पहले तो मम्मी ने की खूब पिटाई फिर प्यार किया, गले से लगाया और बहुत देर तक उसे समझाया मम्मी ने पापा की ड्यूटी लगाई बहनों की नज़रों मे था उनका भाई बहुत दिनों तक रखी गयी नज़र धीरे - धीरे उस का आया असर पास पड़ोस में कहलाते अच्छे अब गिलहरी के तीनों बच्चे - प्रदीप कुमार शुक्ल
कुत्तों से कब तक वह डरती रस्ता देर सबेर का बिल्ली रानी निकल पड़ी हैं पहन हौसला शेर का। - प्रदीप कुमार शुक्ल
ठंड बड़ी है ------------ आसमान में धुँधला सूरज पेंड़ों से लटका है कुहरा आठ बजे हैं रामदीन तो लिए फावड़ा पिला रहा गेहूँ को पानी निपट भोर से चढ़ा रखे मिट्टी के मोज़े ताज़े पानी के दस्ताने भाप जम रही है खेतों पर, भौहों पर, पलकों के ऊपर यहाँ चाय के प्याले पर मैंने भी देखा मुँह निकाल कर कम्बल से मैं थोड़ा सा अलसा कर बोला - ठंड बड़ी है. - प्रदीप कुमार शुक्ल
दिसंबर -------- 1. मुरझाई किरनें सुबह से ही अवसाद की गठरी लेकर बैठ जाती हैं बरोठे में रह रह कर खांस उठता है मुँह लटकाए मरियल दिसंबर l 2. खा खा कर बथुआ के पराठे रात मुटल्ली कितना तो धीरे धीरे चलती है आठ बजा देती है जाते जाते घोड़े पर सवार दिन कब आया कब गया कुछ पता ही नहीं चलता सलूका पहने, अलाव तापता ये दिसंबर भी ना ! 3. नीच कीच से कमल तोड़ते हुए बच्चे ने ध्यान रखा कीच हांथों पर नहीं लगा यह क्या कम है कुछ पंखुरियां तोड़ कर ही मगन है हाथ को हाथ नहीं सूझता और कमल खिले हैं सरोवर से पहाड़ तक भारी कुहरा छाया रहा इस दिसंबर l 4. काली हरी बाजरे की रोटियाँ रोज खाते हुए मन उकता जाता बदलाव के लिए लाल गुलाबी ज्वार की, थोड़ा मुलायम पर मुझे कभी नहीं भाईं फंडा यह था कि बासी रोटी बाजरा ताज़ी ज्वार की चाय के साथ इन रोटियों ने हमेशा चलने से मना किया जब कभी दूध की कमी हुई तो बाजरे की रोटियाँ गला छीलती हुई बमुश्किल पेट में घुस पाईं बथुए का सगपहिता ताज़ी रोटियों के साथ और बासी को गरम दूध के कटोरे में भुरभुरा कर डाल देने का कॉम्बिनेशन सर्वमान्य, सर्वप्रिय रहा इन्ही काली - गुलाबी रोटि...
CAA के खिलाफ़ आंदोलन दरअसल NRC के लिए एंटीसीपेटरी बेल के माफ़िक है। मुझे यह ठीक भी लगता है। परंतु तभी तक जब तक यह अहिंसात्मक रहे और हिंदुओं के खिलाफ़ न हो। इसका असर भी तभी होगा। हालांकि कुछ असर अभी से दिखना शुरू भी हो गया है। संसद में रौद्र रूप धारण किए ग्रुहमंत्री के बयान " 2024 से पहले पूरे देश मे एनआरसी हम लागू कर के रहेंगे ( ऊर्ध्वाधर तर्जिनी के भार सहित ) " के बाद एनआरसी का भ्रम दूर करने के लिए आज के समाचारपत्रों में विज्ञापन की भाषा आप देखेंगे तो आपको फ़र्क साफ़ नज़र आय ेगा। कुछ लोगों का मानना है कि एंटीसीपेटरी बेल की आवश्यकता नहीं है जब एफआईआर होगी तब न मुकदमा लड़िएगा? अभी बेकार मे लत्ते का साँप बना रहे हैं। कुछ कहते हैं, जब आग लगेगी तब कुआं खोदने से क्या लाभ होगा? सयाने लोग समझा रहे हैं, देखिये इस CAA में किसी, मतलब किसी भारतवासी के लिए कोई परेशानी नहीं है, मल्लब बिलकुल्लै नहीं। अब जब एनआरसी के कायदे कानून सामने आएंगे तब न उसकी मेरिट-डिमेरिट पर बातचीत करिएगा। बकिया, गांधी के देश मे हिंसा की कोई जगह बनती नहीं है। यह बात याद रखनी जरूरी है, समय की मांग भी यही है। #...
दाढ़ी वाले बाबा / प्रदीप शुक्ल मेरी भी तो सुनते जाओ दाढ़ी वाले बाबा एक बरस के बाद आज तुम फिर से पड़े दिखाई पूरे बरस तुम्हारी ढूंढे नहीं मिली परछाई ऐसे कैसे गुम हो जाओ दाढ़ी वाले बाबा आये, रख कर चले गए कुछ टॉफ़ी और खिलौने तुम को ढंग से देख न पाया लम्बे हो या बौने कभी बिना दाढ़ी के आओ दाढ़ी वाले बाबा मुझे दांत में दर्द हो रहा टॉफ़ी कैसे खाऊँ गेंद तुम्हारी लेकर बाहर कहाँ खेलने जाऊँ मुझको तुम लूडो दिलवाओ दाढ़ी वाले बाबा अच्छा अगले साल सुनो तुम जब क्रिसमस में आना मेरे वाले सभी खिलौने बस्ती में पहुँचाना चाहो सब वापस ले जाओ दाढ़ी वाले बाबा. - प्रदीप कुमार शुक्ल
# गांधीजी_कहिन 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान मुंबई ( तब बॉम्बे ) में जब सड़कों पर पारसियों और क्रिश्चियनों को आंदोलनकारी हिंदुओं-मुस्लिमों द्वारा मारा-पीटा गया तब गांधीजी छुब्ध होकर ' यंग इंडिया ' में लिखते हैं - " यदि हम अल्पसंख्यक पारसियों और क्रिश्चियनों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे तो क्या गारंटी है कि जब सत्ता बहुसंख्यक हिंदुओं के हाथ में होगी तब अल्पसंख्यक मुसलमानों या बहुसंख्यक कमजोर हिंदुओं को प्रताड़ित नहीं किया जाएगा। "
नया साल ---------- नया साल लेकर आयेगा फ़िर से नये बवाल बस मुक़ाबला ही करना है हमें साल दर साल लगता है जो गुजर गया वह एक बुरा था सपना आने वाला समय हमेशा हुआ कहाँ पर अपना नई सुबह लेकर आती है बिलकुल नया सवाल कहीं सवाल सरहदों का है कहीं धर्म की बातें सड़क किनारे कहीं ठिठुरती बैठी भूखी आँतें नए साल में फ़िर आएगी नई सियासी चाल मूर्छित करती रहीं साल भर ये विषभरी हवाएँ राजा रहें होश मे जनता की हैं यही दुआएँ डूबे नहीं नाव फहराता रहे तिरंगा पाल - प्रदीप कुमार शुक्ल
धुआँ-धुआँ हो गयी कहानी बात हो गयी बहुत पुरानी उसकी बस अब यादें मीठी क्या सखि प्रेमी? नहीं, ' अंगीठी ' गलत किया जो उसे बुलाया  गजब ढा रहा जब से आया हमने उसको बहुत लताड़ा क्या सखि साजन? ना, सखि ' जाड़ा ' जाड़े भर उसको दुलराऊँ बाकी समय भूल ही जाऊँ कहता रहे मुझे वह चीटर क्या सखि साजन? ना सखि ' हीटर ' कभी बोलता ले आऊँगा अभी कह रहा नहीं लाऊँगा क्या गुजराती, क्या बनारसी क्या सखि साजन? न, एनआरसी
यहिमा उलरै कै कउन बात ------------------------------ दारू पी कै ल्वाटै लागेव खावव घर मा तुम दूधु भात यहु सालु सार फिरि-फिरि आई यहिमा उलरै कै कउन बात घुरहू ख्यातन मा कांपि रहे मुरहू होटल मा मजा करैं घुरहू हैं साँड़न के पीछे मुरहू गिलास मा बरफ भरैं कुरिया मा घुरहू हैं अक्याल मुलु देस म मुरहुन कै जमात कुछु लोग सुरसुरी छोंड़ि दिहिन जुम्मन अंदर ते कांपि रहे कुछु लोग धुआं सुलगाय दिहिन दुरिही ते आगी तापि रहे कुछु लीन्हे हैं सतरंज बईठ बसि खेलि रहे सह अउर मात हमहू कंबल मा घुसे बईठ औ मुलुर-मुलुर बस झांकि रहेन तुमहू जो मन मा वहै करौ हम अन्न-गन्न बस हांकि रहेन जब-जब हम जादा सोचि लेई तब-तब हमारि मूड़ी पिरात - प्रदीप कुमार शुक्ल
हिरनी की आँखों में डर है असुरों के बच्चों की अम्मा, ने घर में आरती उतारी यहाँ भेड़िये फिर शिकार पर वहाँ सत्र में बहसें जारी गली मुहाने खुली सड़क पर कदम-कदम पर आखेटक है हिरनी की आँखों में डर है सांस रुकी है, दिल धक धक है गाय रंभाती है खूँटे पर दुबक रही बछिया बेचारी नन्ही परियों के पंखों को रोज़ कहीं वे नोच रहे हैं और यहाँ हम बस दशकों से मुँह लटकाए सोच रहे हैं आधी आबादी के मन में असंतोष की लपटें भारी - प्रदीप कुमार शुक्ल
गिलहरी और उसके बच्चे एक गिलहरी के थे तीन बच्चे एक था बदमाश, दो बहुत अच्छे बदमाश बच्चे की शिकायत आई पहले तो मम्मी ने की खूब पिटाई फिर प्यार किया, गले से लगाया और बहुत देर तक उसे समझाया मम्मी ने पापा की ड्यूटी लगाई बहनों की नज़रों मे था उनका भाई बहुत दिनों तक रखी गयी नज़र धीरे - धीरे उस का आया असर पास पड़ोस में कहलाते अच्छे अब गिलहरी के तीनों बच्चे - प्रदीप कुमार शुक्ल
एक चिड़ा था, एक चिड़ी थी उनके मन मे जंग छिड़ी थी उनकी थी जो नन्ही चिड़िया कितनी भोली, कितनी बढ़िया रात हो रही, कब आएगी? सही सलामत आ पाएगी? चिड़िया गाना गाती आई खुल कर हँसी, खूब मुसकाई बोली, मम्मा मत घबराना जंगल सब जाना पहचाना रस्ते सब आसान यहाँ पर नहीं रहें इंसान यहाँ पर - प्रदीप कुमार शुक्ल
आज संविधान दिवस पर सवाल यह है कि जब जनता ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था तो महामहिम ने अजित दादा को सत्ता पर कब्जा क्यों दिया? श्रीमान फणनवीस जी ने हर रैली मे ' दादा को जेल भिजवाईंग और चक्की पिसाईंग ' का भाषण पिला कर वोट मांगा। जनता ने उनको और उद्धव को सीटें इसीलिए दीं कि हजारों करोड़ के सिंचाई घोटालों मे कथित तौर पर संलिप्त अजित दादा को जेल भेजा जाये। बहुत लोगों ने इसलिए भी भाजपा-शिवसेना को वोट किया कि हमारे युगपुरुष मोदी जी के ' न खाऊँगा न  खाने दूंगा ' वाले जुमले पर उनको विश्वास था। सत्ता के लिए लार टपकाते दूसरे धड़े का भी यही हाल है। जब आप ने एक दूसरे की कमियाँ गिनाकर, गालियां देकर वोट मांगे तो अब गलबहियाँ कैसे कर सकते हैं? उत्तर है : संविधान इसकी इजाज़त देता है। जब कि होना यह चाहिए कि चुनाव पूर्व गठबंधन मे अगर सत्ता की मलाई बांटने मे सहमति नहीं बनती तो सभी को वापस जनता की राय लेनी चाहिए, अनिवार्य रूप से। चुनाव के बाद किसी भी तरह का गठबंधन अनैतिक है। अगर हमारा संविधान इस अनैतिकता को न्यायसम्मत मानता है तो उसमें संशोधन की आवश्...
सत्ता हमने सौंप दी, बटमारों के हाथ फिर-फिर देते हैं उन्ही, अय्यारों का साथ अय्यारों का साथ, हमारे मन को भाया लोकतन्त्र को रोज़, ताश का खेल बनाया राजनीति के चतुर, फेंटते हैं बस पत्ता हमको जोकर बना, भोगते हैं सब सत्ता। - प्रदीप कुमार शुक्ल