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यहिमा उलरै कै कउन बात
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दारू पी कै
ल्वाटै लागेव
खावव घर मा तुम दूधु भात
यहु सालु सार फिरि-फिरि आई
यहिमा उलरै कै कउन बात
घुरहू ख्यातन मा
कांपि रहे
मुरहू होटल मा मजा करैं
घुरहू हैं साँड़न के पीछे
मुरहू गिलास मा बरफ भरैं
कुरिया मा
घुरहू हैं अक्याल
मुलु देस म मुरहुन कै जमात
कुछु लोग
सुरसुरी छोंड़ि दिहिन
जुम्मन अंदर ते कांपि रहे
कुछु लोग धुआं सुलगाय दिहिन
दुरिही ते आगी तापि रहे
कुछु लीन्हे हैं
सतरंज बईठ
बसि खेलि रहे सह अउर मात
हमहू कंबल मा
घुसे बईठ
औ मुलुर-मुलुर बस झांकि रहेन
तुमहू जो मन मा वहै करौ
हम अन्न-गन्न बस हांकि रहेन
जब-जब हम
जादा सोचि लेई
तब-तब हमारि मूड़ी पिरात
- प्रदीप कुमार शुक्ल

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