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 ! कुछ तुम कहो कुछ हम कहें !!

आओ बैठो कुछ बात करें
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें !!
अंतर्मन की गाठें खोलो
चाहे वाणी से मत बोलो
मन की वीणा को झंकृत कर
उसके सुर के साथी हो लो
चुपचाप ह्रदय के अंगारे
आंसू बन अविरल धार बहें
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
आओ बैठो कुछ बात करें
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें !!
ऐसा तो कोई नहीं होगा
जिसने हो ना दुःख भोगा
जो आज लग रहा अनियंत्रित
कल समय तुम्हारे वश होगा
ये तो जीवन का हिस्सा है
सुख दुःख तो हर दम साथ रहें
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
आओ बैठो कुछ बात करें
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें !!
क्या हुआ जो दुःख ने वार किया
तम ने उजास को मार दिया
काली रातें कट जायेंगी
सूरज ने फिर आकार लिया
जो बीत गया सो बीत गया
कब तक उन लम्हों को सहें
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
आओ बैठो कुछ बात करें
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें !!
- डॉ . प्रदीप शुक्ल
29.11.2013

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