घोड़ा ( बाल कविता )
एक नेता ने ख़रीदा एक घोड़ा
गरीब के सिर पर नारियल फोड़ा
घोड़ा माल खाता रहा
गरीब सिर सहलाता रहा
गरीब के सिर पर नारियल फोड़ा
घोड़ा माल खाता रहा
गरीब सिर सहलाता रहा
फ़िर घोड़े ने नेता को उछाल कर गिराया
एक और नेता को पीठ पर बिठाया
अब घोड़ा ख़ुद एक नेता है
सारी घास ख़ुद लपक लेता है
एक और नेता को पीठ पर बिठाया
अब घोड़ा ख़ुद एक नेता है
सारी घास ख़ुद लपक लेता है
आजकल मुंबई मे है मेला
और घोड़ा नहीं है अकेला।
और घोड़ा नहीं है अकेला।
- प्रदीप कुमार शुक्ल
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