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शहर से जा कर घंटे दो घंटे पिकनिक मनाना और बात है, खेती करना बिलकुल अलग अनुभव है l
कटाई के समय बाबा सुबह चार बजे ही उठा देते l हम अपनी - अपनी हंसिया खटिया के नीचे रात में ही रख लेते थे l गेहूं, अरहर की फसल काटने से लेकर भूसा और झाँखर घर तक लाने में पूरे दो महीनों का वक्त लगता l यह एक तरह का युद्ध होता था सबकी छुट्टियां इस दौरान कैंसिल होतीं l
अभी सोचता हूँ तो नॉसटैल्जिया के खुमार में सब बहुत सुहाना लगता है l उस समय मई की दोपहर एक बजे भूसा लदी बैलगाड़ी से जब रस्सी टूट जाय या खिसक जाय .. बोरे, गठरियाँ गलियारे में छितर जाएँ और कुल जमा चार लोग l दो आदमी - दो बैल l प्यासे होठ और पनीली आंखें l जिन्होंने नहीं भुगता है वह तो कल्पना भी नहीं कर सकते l
आज तीस साल बाद भी किसान की स्थिति कमोबेश वही है l नातेदार काका को आज फुर्सत नहीं थी दो घड़ी साथ बैठने की l सुबह देर से शुरू कर पाए तो दोपहर एक बजे तक कटाई चली, अब बोझ बाँधने में लगे हैं l आधे घंटे की आंधी पूरे साल की मेहनत उड़ा ले जायेगी l पूरा परिवार युद्ध क्षेत्र में है l
किसान को उसका हक़ मिलना ही चाहिए l
फ़ोटो भी पिकनिक की ही अच्छी लग सकती हैं।

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