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भोरे - भोर लखनऊ
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बहुत सालों बाद आज भोरे - भोर लखनऊ दर्शन हुए l वजह बने दिल्ली से तशरीफ़ लाए कविता कोश के ललित कुमार जी, शारदा सुमन जी और राहुल शिवाय जी l

थोड़ा नया लखनऊ, गोमती उस तरफ, थोड़ा पुराना लखनऊ गोमती इस तरफ l गोमती पुल पर खड़े होकर सूर्योदय करवाया फिर सूरज देवता को साथ लिए खरामा - खरामा चले आए नवाबों की गलियों में l रूमी दरवाजा जो मुझे हमेशा बुलंद दरवाजा के नाम से याद आता है, अपनी जगह पर ही खड़ा मिला l उसे देखकर कुछ यूं लगा जैसे कोई बूढ़ा नवाब रात देर से सोया हो और सुबह - सुबह उनींदे में बिस्तर पर बैठा हुआ है l

खैर, हमें क्या करना हम तो फ़ोटो - शोटो खींच - खांच कर चले गए नक्खास l वहाँ इतवारी बाजार में आज पक्षी बाजार भी था l रँग बिरंगी छोटी बड़ी चिड़िया और खरगोश और छोटे बड़े तोते और मैना और .... मन तो किया सबके पिंजड़े खोल कर उड़ा दूं पर संभव नहीं था l आधे तो पिंजरा खोलने पर भी उड़ने को शायद तैयार न होते, जहनी रूप से कैद के आदी हो चुके होंगे l बाक़ी का बाजार तो दोपहर तक लगेगा अभी सब नवाबजादे आराम फरमा रहे होंगे l हम लौट आये, बिना कुछ मोल भाव किये l लौटते बखत हमने सोचा अपना कालिज भी देख लूं सो देख लिया l सुबह सुबह वह भी बात के मूड में नहीं था और हमको भी उससे कुछ बतियाने के लिए एकदम से कुछ सूझा नहीं l

वहाँ से नद्दी का किनारा जो पकड़ा तो उसने क्लार्क्स अवध के पास मेट्रो की भूलभुलैया में छोड़ दिया l जाना था हम लोगों को शर्मा जी के यहाँ चाय पीने पर पहुँच गए हजरतगंज चौराहे पर कॉफ़ी हाउस के सामने l पर वहाँ कहां कॉफ़ी हाउस धरा था, वह तो बस हमारे जेहन में एक कोने में बैठा हुआ मिला l

तलब जोरों की थी तो विधान भवन को सलाम ठोंकते हुए हमलोग घूमते - घामते पहुँच गए भोपाल हाउस के नुक्कड़ वाले शर्मा जी के चाय हाउस पर l वहाँ तो खड़े होने की जगह नहीं थी l करीब ढाई सौ आदमी चाय और बंद ( बन ) मक्खन खाने पर उतारू l बमुश्किल हम भी खाए - पिए और भाग लिए अपने गरीबखाने के लिए l

इस दौरान ललित जी ने अपने ख़ास कैमरे से फ़ोटो खींचीं तो हमने भी अपने आम मोबाइल से उलटी - सीधी खैंच डालीं l

- प्रदीप शुक्ल

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