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सोशल मीडिया में मजाक का विषय बने " जिओ इन्स्टीट्यूट " के बारे में तथ्यों की पड़ताल :
यह सच बात है कि जिस ' जिओ इन्स्टीट्यूट ' को मानव संसाधन मंत्रालय ने इन्स्टीट्यूट ऑफ़ एमिनेन्स की कैटेगरी में आई आई टी मुंबई, आई आई टी दिल्ली जैसे दिग्गजों के साथ जगह दी है उसके पास कोई क्लास रूम तो क्या उसकी नींव तक नहीं खोदी गई है l लेकिन इसको पूर्णता में समझने की आवश्यकता है l
मंत्रालय द्वारा जिस ग्रीनफील्ड कैटेगरी में इसे नामित किया गया है उसमे किसी बिल्डिंग, क्षात्रों की संख्या आदि का जिक्र ही नहीं है l इसके लिए निर्धारित मानक हैं : उपयुक्त मात्रा में विवाद रहित भूमि की उपलब्धता, संस्थान का दृष्टिकोण, कोर टीम, धन की उपलब्धता और संस्थान की लोकेशन l इन मानकों को ध्यान में रखते हुए ग्यारह व्यावसायिक समूहों ने आवेदन किया जिसमे से रिलायंस समूह को सफलता मिली l अन्य समूह थे भारती एयरटेल, वेदांता और क्रेया फाउंडेशन आदि l इस सफलता के पीछे मुकेश अम्बानी की भारत सरकार में अपनी खुद की हैसियत कितनी काम आई, यह तो कोई नहीं बता सकता परन्तु व्यक्तिगत रिश्ते महत्वपूर्ण होते हैं इस से भला कौन इनकार कर सकता है l
महाराष्ट्र में 800 एकड़ अधिग्रहीत जमीन पर प्रस्तावित जिओ इन्स्टीट्यूट की कोर टीम के लीडर हैं 1979 बीच के रिटायर्ड आई ए एस मि. ओबेरॉय l ओबेरॉय जी २०१६ में मानव संसाधन मंत्रालय में सेक्रेटरी थे l ध्यान देने वाली बात यह है कि इन्ही के कार्यकाल में पहली बार इस तरह का प्रस्ताव 2016 में लाया गया था l इस परिस्थिति को दो तरह से देख सकते हैं l एक तो यह ( जिसकी संभावना अधिक है ) कि मि. ओबेरॉय इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट की मूल भावना से खूब अच्छी तरह से परिचित हैं इसलिए उन्होंने रिलायंस का प्रस्ताव सबसे उत्तम तरीके से रखा l आप ऐसा भी सोच सकते हैं कि प्रोजेक्ट का प्रस्ताव मंत्रालय में बनाते समय ही रिलायंस का ध्यान रखा गया l
अब आते हैं अगले पांच वर्षों में प्रस्तावित संस्थाओं को सरकार द्वारा 1000 करोड़ रुपये अनुदान में देने वाली बात पर l यहाँ भी सोशल मीडिया पर अर्धसत्य फैलाया जा रहा है l तथ्य यह है कि किसी भी प्राइवेट संस्थान को एक नया पैसा भी सरकार द्वारा अनुदान नहीं दिया जाएगा l यह केवल सरकारी संस्थाओं के लिए प्रस्तावित है l हाँ, नियमों में कई प्रकार की शिथिलताएँ उन्हें जरूर दी जायेंगी जिनमे कुछ लाभ पहुंचाने वाली स्थिति भी बन सकती है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है l
- प्रदीप शुक्ल
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