नीलकंठ बाबा
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आज दशहरे के दिन राम सिंह ठेकेदार अपनी बोलेरो छोड़ पैशन प्लस पर सवार होकर मुहं अँधेरे ही घर से निकल पड़ा. उसे याद है पिछले दशहरे में पूरा दिन खोजने के बाद भी उसे नीलकंठ के दर्शन नहीं हुए थे. आज उसे महुए और आम के दो पुराने पेड़ कटवाने बगल के गाँव जाना था. ट्रेक्टर ट्राली और आरा, कुल्हाड़ों से लैस उसके आदमी भी पीछे - पीछे थे.
काफी दूर का चक्कर लगा कर लौटे राम सिंह को वहीं पास के खेत में ठूंठ पर बैठे नीलकंठ दिखाई पड़े. आहिस्ता से मोटरसाइकिल बंद कर राम सिंह ने नीलकंठ बाबा को हाथ जोड़, सर झुका कर राम - राम का जाप किया. तभी महुआ काट रहा अंगदवा चिल्लाया, " भईया, यहिमा तो अंडा हैं, चिरई केर, थोरे दिन रुकि न जावा जाय? "
अरे नाहीं, मामा लोग फिर पइसा मंगिहैं थाने पर, अंडा लई आव, होई सकति यही नीलकंठै केर होयं. आजु दसहरा आय, सुभ होई इनका खाबु "
पुरखों की सुनाई कहानी पर विश्वास किये बैठा नीलकंठ कि राम ने रावण वध से ठीक पहले नीलकंठ को देखा था, भ्रमित हो रहा था. दुःख और अविश्वास से वह राम सिंह को देखकर मन ही मन बुदबुदाया,
" रावण, तूने भी नाम बदल लिया."
" रावण, तूने भी नाम बदल लिया."
- प्रदीप कुमार शुक्ल
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