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अकस्मात् ही डॉ प्रवीण झा का पीछा करते - करते इस दस हजारी ग्रुप में शामिल हो गया l शुरुआत में तो बस कभी कभी घूमने चला जाता था ग्रुप की वाल पर l लोग बीस हजार - चालीस हजार कदम पोस्ट करते और मैं सहम कर लौट आता l दरअसल मैं पिछले बीस महीनों से सुबह - सुबह नियमित चल रहा हूँ l कभी कभार छुट्टी को भी मन में नियमित ही मान लेता था l नियमित होना कितना दुष्कर है, यह तो सौ दिनी चैलेंज के बाद पता चला l
जून के किसी दिन मैं सुबह एक गंभीर मरीज के चक्कर में वाक पर जा नहीं पाया तो शाम को 6 बजे मैंने अपने कदम पूरा करने के लिए ज्यों ही शुरुआत की कि फिर मरीज l मुझे वापस लौटना पड़ा l रात ग्यारह बजे मैं बुरी तरह थका हुआ था पर किसी तरह कदमों की संख्या पूरी की l
दरअसल मेरे नियमित होने में सबसे बड़ा योगदान अगर किसी का है तो वह है कुत्तों का l जी, आवारा कुत्ते l हम लोग जहां सुबह वाक पर जाते हैं वहां कुत्तों - पिल्लों की पूरी एक मंडली है जिनके सुबह के नाश्ते की महती जिम्मेदारी मेरी श्रीमती जी के कन्धों पर है l जाड़ा - गरमी - बरसात कोई बाधा डॉ वीना को अब तक रोक नहीं पाई l
मुझे अफ़सोस है कि मैं रोज दस हजार कदम नहीं चल पाया लेकिन अपना वजन 86 से 80 जरूर ले आया l इसके पीछे कैलोरी प्रबंधन की भूमिका ज्यादा थी लेकिन इस प्रबंधन के लिए उत्प्रेरक निःसंदेह यही सौ दिनी चैलेन्ज ही था l
सभी सहभागियों खासकर एडमिन नीता सिंह वत्स का उत्साहवर्धन काबिलेतारीफ़ था l

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