सालगिरह
आषाढ़ के आज ही की तरह किसी उमस भरे दिन, गाँव की एक अँधेरी कोठरी में मेरा जन्म हुआ l बच्चों के बहुतायत वाले घर में पैदा होना पूरे परिवार के लिए भले ही कोई बहुत आह्लादकारी क्षण न रहा हो पर माँ की ममता तो बस बरस ही पड़ी होगी l माँ बताती हैं कि उस दिन मेरे पैदा होने के बाद खूब बरसे बादल और मैं माँ की गोद में दुबका रहा कई घंटों तक बिना हिले डुले l
संयुक्त परिवार के लगभग दर्जन भर भाई बहनों की सालगिरह एक जैसी ही होती l दिन में अम्मा बुआओं और दादियों के निर्देशन में हाथ ऊंचा करा डोरा नापतीं, काले तिल मिला हुआ दूध पिलातीं, रोचना लगातीं, गुलगुले बनातीं l शाम को बुलउवा होता दीदियाँ, भाभियाँ, चाचियाँ मिलकर ढोलक पीटतीं, गौनई होती, गुलगुले और बताशे बँटते l बस, अगले बच्चे की तारीख तय होती और समारोह ख़त्म l
घर से बाहर स्कूल में, दोस्तों के साथ जन्मदिन मनाने का चलन नहीं था l किसी दोस्त का कभी जन्मदिन याद भी नहीं रहा l मेडिकल कॉलेज में पहली बार घर से बाहर बर्थ डे पूछा गया तो जो लिखा पढ़ी में था वही चल निकला l
कई सालों तक मैं अपना जन्मदिन जनवरी में ही मनाता और मानता रहा l वह तो भला हो शादी के समय खोजी गई जन्मकुंडली का जिसकी बिना पर यह तय हुआ कि 29 जून को इस गोले पर मेरा पदार्पण हुआ l अम्मा को आज भी 29 जून नहीं याद है l वह तो लगते आषाढ़ की कोई तिथि बताती हैं जो मुझे याद नहीं रहती l
तिथि तारीख से क्या लेना देना l माँ का आशीर्वाद तो हर क्षण मेरे साथ है, पूरे जीवन रहेगा l मुझे नहीं याद पड़ता कि मेरे जन्मदिन पर कभी माँ साथ न रही हों l
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