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संसद में कल हुए नाटक को देखने के बाद इतना तो स्पष्ट हो गया कि राहुल गांधी एक अपरिपक्व अभिनेता हैं l यह बात भी तय है कि अपने पार्ट की स्क्रिप्ट भी उन्होंने खुद ही लिखी, और शायद उसी समय l वरना उनके गिरोह में भी गुरू घंटालों की कमी नहीं है l दूसरी तरफ थे सदी के महानायक, न भूतो न भविष्यति l
कल जब राहुल जी स्क्रिप्ट के आख़िरी दृश्य को अभिनीत कर रहे थे तब बहुत सहज नहीं दिखे l चाहिए तो यह था कि राहुल अपनी सीट से यह कह कर चलते कि " इतनी गालियों के बाद भी मैं मोदी जी को गले लगाना चाहता हूँ l " और वहाँ पहुँचने से पहले शाहरुख खान की तरह दोनों हाथ फैला देते l तब मजबूरी में मोदी जी को उठ कर गलबहियां करनी होती l पिक्चर परफेक्ट होती l
पर यह हो न सका l ऊपर से बाईं आँख चल गई l
इस प्रकरण से ऐसा भान होता है कि राहुल कोई मंझे हुए कलाकार नहीं हैं l
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हमें राजनीति में केवल मंझे हुए कलाकार ही चाहिए?

जब राहुल जी मोदी जी के गले लगने को आतुर ही थे तो बड़े होने के नाते उन्हें गले लगा लेना चाहिए था। उस समय यदि मोदी जी अकबका गए थे तो कम से कम जब दुबारा बुलाया था तभी उठ कर गले मिल लेते। प्रधानमंत्री का यह आचरण अहंकार से भरा हुआ था। कुछ अच्छा नहीं लगा।
हालांकि राहुल का भी कृत्य काफी बचकाना लगा। पप्पू नाम चरितार्थ कर दिया राहुल जी ने।

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