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देखो आगे मौलसिरी है
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दिल में आँसू के सागर हैं
होठों पर मुस्कान धरी है
सबसे आगे
हो जाने की
बस जीवन में होड़ मची है
सुबह-शाम के सोपानों ने
टेढ़ी-मेढ़ी कथा रची है
काँटों पर बैठे फूलों के
चेहरों पर उजास बिखरी है
कोलाहल है
जगर-मगर है
भीड़-भाड़ है यहाँ शहर में
दो जोड़ी बूढ़ी आँखों में
खालीपन पसरा है घर में
आशंकाओं की साँसों में
अन्दर तक उम्मीद भरी है
मगर हो सके
तो सचमुच में
तन से मन से तुम खुश रहना
दुख की धूप तेज़ होगी, पर
उसको भी तुम हँस कर सहना
पैरों में बबूल के कांटे?
देखो आगे मौलसिरी है
ग्रामीण परिवेश से जुड़े बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. प्रदीप शुक्ल एक प्रतिष्ठित बाल चिकित्सक कवि हैं और इसके अतिरिक्त एक बहुत अच्छे इन्सान भी। साहित्य की विभिन्न विधाओं में उनकी पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। नवगीत की दिशा में उनकी लेखनी उन्हें प्रतिष्ठा के स्तर पर स्थापित करने में निरन्तर अग्रसर है। डॉ. शुक्ल सीधे ज़मीन से जुड़े हुए मृदुभाषी और लोकप्रिय व्यक्ति हैं। उनके गीतों में वैज्ञानिक सोच, उनके शिल्प, शैली को पूरी तरह नवोन्मेष अर्थ प्रदान करती है। प्रस्तुत पुस्तक ‘गाँव देखता टुकुर-टुकुर’ के नवगीतों में डॉ. प्रदीप शुक्ल ने आज के जटिल जीवन और मानवीय सरोकारों से जुड़े कथ्य को बड़ी सहजता के साथ प्रस्तुत किया है। स्वाभाविक बोधगम्य भाषा में ये नवगीत समकालीन युगबोधजनित लोक संवेदना को तत्समबहुल शब्द विन्यास और सुदृढ़ प्रतीक व बिम्ब योजना के माध्यम से संप्रेषणीय बनाने का सफल अनुष्ठान है।
-निर्मल शुक्ल
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