वह आए तो जिया अधीर
अँखियों से बस छलके नीर
गले लिपट कर, कर लूं प्यार
क्या सखि साजन?
नहीं ' दुलार '
अँखियों से बस छलके नीर
गले लिपट कर, कर लूं प्यार
क्या सखि साजन?
नहीं ' दुलार '
- प्रदीप शुक्ल
मौन हुए हम, जब वह आया
घर में डोलूँ बन कर छाया
कैसे कहूं कि हूँ आजाद
क्या सखि साजन? न, ' अवसाद '
घर में डोलूँ बन कर छाया
कैसे कहूं कि हूँ आजाद
क्या सखि साजन? न, ' अवसाद '
मौमौन हुए हम, जब वह आया
घर में डोलूँ बन कर छायाकैसे कहूं कि हूँ आजाद
क्या सखि साजन? न, ' अवसाद 'न हुए हम, जब वह आया
घर में डोलूँ बन कर छाया
कैसे कहूं कि हूँ आजाद
क्या सखि साजन? न, ' अवसाद '
घर में डोलूँ बन कर छाया
कैसे कहूं कि हूँ आजाद
क्या सखि साजन? न, ' अवसाद '
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कह मुकरी
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