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ललगुदिया अमरूद और गधे की लीद
अभी पिछले हफ्ते गाँव गया था तो टहलते - टहलते वहाँ पहुँच गया जहां दरअसल मुझे जाना नहीं चाहिए था. सामने मेरे एक विशाल गड्ढा था. गड्ढे में मिटटी की ईंटे पाथी जा रही थीं और गधों द्वारा बगल के भट्ठे पर पहुंचाई जा रहीं थीं. मानो देश के गधे पसीना बहाते हुए देश के महान नेताओं की तिजोरी भर रहे हों. गड्ढे में ठीक उस जगह जहां पर गधे और आदमी की लीद गुत्थमगुत्था थीं, वहीं पर मेरे परम प्रिय ललगुदिहा अमरुद का पेड़ हुआ करता. अक्सर मेरा कोई दोस्त या भाई पेड़ पर चढ़कर डंडे से अमरुद गिराता और मैं झपट लेता. मुझे लगा इसी लीद के नीचे मेरा अमरुद दब गया है. जैसे भ्रष्टाचार की लीद देश के ऊपर छोपी हुई है. लोग कहते हैं कि हमारे देश से आत्मा को गए कई दसक बीत चुके हैं बस लीद बची है. पर मेरा दिल तो लीद के नीचे अपने ललगुदिया को खोजने में लगा हुआ है, जो शायद कब का बिला चुका है.
आज जहां पर इंसानों और गधों की लीद से विभूषित यह विशाल शाश्वत गड्ढा मौजूद है वहाँ पर कभी एक बहुत खूबसूरत बागीचा हुआ करता था. मेरे पितामह के पितामह के छोटे भ्राता ने कलकत्ता से मेहनत से कमाकर लाये हुए चांदी के रुपयों से इस चार एकड़ में फैले बागीचे को बहुत मनोयोग से लगाया था.
कहते हैं जब यह बागीचा तैयार हुआ था तो दूर - दूर तक इसके टक्कर का बाग़ नहीं था. बाग़ के चारों तरफ पुरसा - पुरसा खाईं, अन्दर चारो तरफ पैदल का रास्ता जिनके किनारे - किनारे गेंदा के फूल. बाग़ के ठीक बीचोबीच में बड़ा सा खुला मैदान जिसमे एक हाहाकारी फूस का बँगला. वहाँ से निकलती हुई चारों दिशाओं में दो - दो लट्ठे चौड़ी कच्ची सड़कें. एक कोने में सिंचाई के लिए पुरही लगा गहरा कुआं. सड़कों ने पूरी बाग़ को चार छोटे बागों में तब्दील कर दिया था. दो में कलमी आम के पेड़ थे. खूब मीठे और खूब बड़े. एक हिस्से में कई तरह के अमरुद. बचे हुए एक हिस्से में नारंगी, जामुन, नींबू, करौंदा, कमरख, बेल, अनार, इमली के पेड़.
हमसे पहले की हमारी पीढ़ियों ने मीठे अमरुद खाए, रसीले आम खाए, पुरखों की जय जय कार की. खूब पसीना बहाया, पुरही चलाई, बेड़ी लगाईं और पुरखों के लगाए पेड़ों की पुरखों की तरह सेवा की.
हमारी पीढ़ी को आम कडुआने लगे, अमरुद अचानक से स्वाद में गोबरहे हो गए, करौंदे के कांटे आँखों में चुभने लगे.
हम सभ्य हुए. विकास की राह पर हमने पुरखों को किनारे बैठा दिया और उनके लगाए पौधों को खरपतवार समझ कर ठिकाने लगा दिया. हम भूखे थे. हम फल नहीं सीधे पेड़ खा गए. अपने पुरखे पेड़ों की जड़ें खोद डालीं, कि कहीं गलती से फिर न हरिया आयें. हमारी भूख शांत नहीं हुई. पुरखों के पसीने से सनी मिट्टी भी हमने बेच डाली. हम विकास की राह पर घिसटने लगे.
आज विकास के गड्ढे को देखकर मुझे लगा कि जैसे मेरे पुरखे समवेत स्वरों में कह रहे हों, बेटा तुम्हारी किस्मत में ललगुदिया अमरूद नहीं है. तुम गधे की लीद के लायक ही हो.
- प्रदीप कुमार शुक्ल

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