यह जो प्रकाश मनु जी हैं।
इस बार दिल्ली बहुत दिनों बाद जाना हुआ l सात दिसंबर को सुबह पांच बजे लखनऊ से निकला तो गुरूग्राम में एक निओनेटल वर्कशॉप से शाम पांच बजे छूटा l मोबाइल बैटरी के साथ साथ मेरी खुद की बैटरी ने डिस्चार्ज होने के संकेत प्रेषित करने शुरू कर दिए थे l होटल में चेक इन करते करते फ़ोन लगाया प्रकाश मनु जी को l उधर से वही वात्सल्य रस से सराबोर आवाज़, हाँ ... प्रदीप, कैसे हो? सुनकर तसल्ली हुई l पिछली दो बार से सर की आवाज़ फ़ोन पर कुछ थकी थकी सी लगी थी l परन्तु आज तो वह बिलकुल चहक रहे थे l जैसे ही पता चला मैं यहीं दिल्ली के आस पास हूँ, बोले " आ जाओ मैं इंतज़ार कर रहा हूँ l " मुझे अचानक आभासी दुनिया में उनसे पहली मुलाक़ात याद आने लगी.
मई दो हजार पंद्रह में डरते - डरते मैंने फेसबुक के इनबॉक्स में बाल साहित्य के दो धुरंधरों को अपनी रचनाएं पढ़वाने के लिए अनुमति मांगी. एक ने तो सीधा मना कर दिया कि मेरे लिए यह संभव नहीं है.
ठीक बात भी थी. फेसबुक पर कवियों की बाढ़ आई रहती है हर दम. कोई भी व्यक्ति उलटी - सीधी दो चार लाईन लिख कर खुद को महान कवि ही नहीं समझता बल्कि उसे यह भी मुगालता होने लगता है कि स्थापित साहित्यकार उससे भय खाने लगे हैं. बस, इसीलिए वे मेरी कविताओं की तारीफ़ नहीं करते.
इसी फेसबुकिया लेखन की भीड़ में, मैं भी शामिल था. पर अपने आपको साहित्यकार समझने में तो मुझे अभी तक संकोच होता है. उस समय तो खैर स्थापित साहित्यकारों से बात करते हुए ही डरता था.
बालगीतों की तुकबंदी मैंने शुरू की सन 2014 में. शुरुआत हुई फेसबुक से. जैसा कि यहाँ पर हमेशा होता है आप कुछ भी लिख कर डाल दीजिये आपको वाह - वाह करने वाले कुछ लोग मिल ही जायेंगे. फेसबुक की वाह - वाह और लाईक्स सहेजते - समेटते मुझे शंका होने लगी कि जो कुछ मैं लिख रहा हूँ वह साहित्य की श्रेणी में आता भी है कि नहीं. इसी क्रम में मैं अपनी रचनाओं को समेटे किसी स्थापित रचनाकार को पढ़वाने के लिए इनबॉक्स खटखटाने लगा.
इस बार जब इनबॉक्स की खिड़की खुली तो उस तरफ दूसरे धुरंधर थे प्रकाश मनु जी. उम्मीद के विपरीत जिन्होने न केवल मेरी कच्ची - पक्की बाल कविताओं को पढ़ा, बल्कि मेरा नं मांगकर खुद मुझसे बात की. मुझको तो बस खुशी का खजाना मिल गया.
सच बात तो यह है कि तब तक मैं उनका लिखा साहित्य कुछ भी नहीं पढ़ पाया था. लेकिन फेसबुक की साहित्यिक बिरादरी में उनका स्थान देखकर मेरे लिए यह अनुमान लगान कठिन नहीं था कि प्रकाश मनु जी बाल साहित्य के पुरोधाओं में से एक हैं. मेरी स्थिति उस समय एक ऐसे बालक के जैसी थी जिसने अभी - अभी नाव, नदी, पहाड़ बनाना सीखा हो और वह अपनी ड्राइंग बुक ले कर बड़ों के पास लेकर दौड़ रहा हो कि एक बार वह मेरे बनाए चित्र देख भर लें. ऐसे में कोई नामी चित्रकार रास्ते में मिल जाए और बच्चे को पास बुलाकर कहे " जाओ अपनी ड्राइंग बुक ले आओ देखें, सुना है तुम बहुत उम्दा चित्र बनाते हो." ऐसे में जो स्थिति उस बच्चे की होती वैसा ही मैं महसूस कर रहा था जब मनु जी ने मुझे लिखा " प्रदीप, तुम एक साथ अपनी कई कवितायें मेरी मेल पर भेज दो मैं उन्हें पढ़ना चाहता हूँ."
उनकी व्यस्तता और समयाभाव को देखते हुए मैंने संकोच प्रकट करते हुए उनसे अपने पहले बालगीत संग्रह की भूमिका के लिए अनुरोध किया. कहना न होगा उन्होंने अविलम्ब, सहर्षता से मेरा अनुरोध स्वीकार किया. मनु जी ने मेरी सारी इक्यावन कवितायें पढ़ीं और बहुत ही आत्मीयता और प्यार से बहुत ही सुन्दर भूमिका मेरे पहले संग्रह " गुल्लू का गाँव " के लिए लिखी. और इस तरह वह बालसाहित्य में मेरे अभिभावक बन गए.
उनसे फोन पर बात होते ही मेरी बैटरी तो पूरी तरह चार्ज हो गई थी, मोबाइल चार्ज करने का समय नहीं था l सामान होटल के रिसेप्शन पर ही पटक कर मैं ड्राइवर मुकेश के साथ फरीदाबाद की ओर निकल पड़ा l कार में बैठते ही यादों के घोड़े दौड़ने लगे और अगले ही क्षण मैं मनु जी के दरवाजे पर था. सेक्टर 29, फरीदाबाद......
पहली बार भी दिसंबर में ही मैं अपने पहले बालगीत संग्रह " गुल्लू का गाँव ' की कुछ प्रतियां लेकर मनु जी के घर पहुंचा था. उनसे जब सामना हुआ तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई व्यक्ति इतना सरल भी हो सकता है. मिलते ही गले से लगा लिया जैसे बरसों बरस से मुझे जानते हों.
डॉ सुनीता जी भी उतनी ही स्नेही और निश्छल. कुछ मिनट सोच कर गया था और तीन घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला. दोनों लोगों ने सब काम छोड़ कर मेरी राम कहानी सुनी. पहली मुलाक़ात में मैं बस बोलता ही रहा और दोनों लोग बस सुनते रहे. मेरे जीवन की ऊबड़ - खाबड़ कहानी के बीच उन्होंने अपने संघर्ष की थोड़ी बहुत बातें साझा कीं. गरमागरम पराठे खाए, चाय पी और चलने के लिए जब तैयार हुए तो सर ने बाहों में भरते हुए कहा, " खूब खुश रहो प्रदीप, बस ऐसे ही रहना, बदलना नहीं." अपने जीवन में पहली बार किसी से मिलकर मैं इतना खुश कभी नहीं हुआ.लौटते समय मेरे पास उनकी ढेर सारी पुस्तकें, पत्रिकाएं और खूब सारा प्यार था.
......... ये सब सोचते हुए कब फरीदाबाद आ गया मुझे पता ही नहीं चला. मुकेश को भी सेक्टर 29 का कोई अंदाजा नहीं हो रहा था. वो कोई एक मोड़ है जहां से मुड़ते हैं, मैं मुकेश को बताने की कोशिश कर रहा था l जरवल मोड़ ... नहीं ... नरवल मोड़ ... नहीं ये भी नहीं ... मैं चार अक्षरों के कई शब्द बुदबुदा रहा था लेकिन कोई मुझे ठीक नहीं लग रहा था l मुकेश भी कुछ समझ नहीं पा रहा था l मैंने फिर से कोशिश की, अरे! वही जहां पर एक बार राहुल गांधी मोटरसाइकिल के पीछे बैठ कर गए थे l अब मुकेश को क्या पता कि मैं अपने दिमाग के कोने मैं ऐसे ही कोई जानकारी टैग कर के डाल देता हूँ l खैर, जैसे तैसे मैंने याद किया " भटकल मोड़ " l पूछा, तो पता चला काफी पीछे छोड़ आए हैं l आगे से बाईपास पकड़ कर आप वापस सेक्टर 29 पहुंचिए, ऑटो वाले ने बताया l बची हुई बैटरी पर गूगल मैप सवार हुआ और हम खरामा खरामा पहुँच गए गेट नं पांच l उससे पहले के एक बंद गेट में घुसते घुसते बचे l महिला मधुर आवाज में अनवरत बोले जा रही थी ... दाईं ओर मुड़िये ... दाईं ओर मुड़िये l
घर मेरा जाना पहचाना था और उसमे रहने वाले लोग भी l मनु जी और सुनीता जी से मिलकर बिलकुल आनंद आ जाता है l दो घंटे उनके साथ कैसे बीत गए, कुछ पता ही नहीं चला l घी से बघारी दाल, चौलाई की सब्जी और गरमागरम रोटियाँ ... साथ में ढेर सारी बातें, ज्यादातर आप बीती l इस बार आपबीती बताने की बारी थी सर और मैडम की. मजा तो ये कि दोनों लोग मेरी बेमतलब की बातें भी बड़े मनोयोग से सुनते रहे l किस्सों में जो भी आया, उसकी बड़ाई, बस बड़ाई l भूल से भी किसी में कुछ बुरा देखते ही नहीं l अचानक परसाई जी याद आने लगते हैं और मन पुलकित हो जाता है कि मेरा भी ऐसा ही सुन्दर सा खाका वह दूसरों के सामने ख़ींचते होंगे l
अभी हाल ही में बाल साहित्य के इतिहास पर लिखी उनकी पुस्तक के बारे में फेसबुक पर कुछ स्वनामधन्य बाल साहित्यकारों ने काफी विरोध में भी लिखा. मनु सर फेसबुक पर कभी कभार ही आते हैं. एक दिन फोन पर ऐसे ही बातों बातों में मैंने इसका जिक्र किया तो उन्होंने सुनने से मना कर दिया. कहा प्रदीप, हर आदमी को अपनी बात कहने, अपनी राय रखने का अधिकार है. वही लोग मेरे बारे में बहुत बार अच्छा भी तो कहते हैं. अब अगर वह मेरे काम के बारे में शंकाएं प्रकट कर रहे हैं तो हो सकता है कि हमारे काम में कुछ कमियाँ रह गईं हों. किसी तरह की तू तू - मैं मैं में मेरी दिलचस्पी नहीं है."
" प्रदीप, किसी का कुछ अच्छा लिखा पढो तो औरों को भी बताया करो l बालवाटिका के लिए गर्ग जी इतनी मेहनत करते हैं, कभी कभी पत्र लिखा करो पत्रिका को l " मनु जी कहते हैं कि मेरे एक गुरुजी थे जो कहा करते थे कि यदि तुमने कुछ अच्छा पढ़ा और कुछ लिखा नहीं उस पर, तो अगले जन्म में गूंगे पैदा होगे, भई मैं तो गूंगा नहीं होना चाहता l
मैं इतना आलसी हूँ कि बार बार वायदा करने के बाद भी कुछ नहीं लिख पाता, गूंगे होने की प्रबल संभावना है l
कुल दो - तीन मुलाकातों में ही वह मुझे बहुत स्नेह करने लगे हैं. कभी - कभी भावुक होकर सर कह उठते हैं, " प्रदीप, तुममे मुझे अपना अक्स दिखाई पड़ता है. मैं तुम्हे अपना बेटा ही मानता हूँ." तब मेरा मन प्यार, श्रद्धा और गर्व से भर जाता है. एक सरल, आडम्बरविहीन, संवेदनशील मनुष्य को अपने इतना निकट पाकर मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूँ.
उनसे बार - बार मिलने और उनके साथ खूब समय बिताने का मन करता है l ऐसे पवित्र हृदयों से मिलना आपको इस कठोर समय में थोड़ा सरल बनने का अवसर प्रदान करता है l
प्रकाश मनु सर, आपका स्नेह मुझ पर ऐसे ही बरसता रहे.
प्रणाम.
प्रणाम.
- प्रदीप कुमार शुक्ल
लखनऊ
लखनऊ
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