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!! माँ !!
हरदम मेरा साथ निभाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
जो तूने सपने बोये थे
वो अब कितने बड़े हो गए
कल गोदी में खेल रहे थे
आज सामने खड़े हो गए
मेरे सपनों के पीछे भी
तेरे ही सपने हैं सारे
मेरी आँखों के सपनों को
तुम अपनी पलकों पे सुलाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
हरदम मेरा साथ निभाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
जब बचपन को याद करू मैं
बस तू ही तू याद आती है
चेहरों को ढूँढने चलूँ तो
तेरी सूरत बन जाती है
अब मैं जो भी याद करूं वो
सारे तेरे अफ़साने हैं
बाकी सब आवाजें मद्धिम
याद रहे बस तेरा गाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
हरदम मेरा साथ निभाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
यादों में गर पीछे जाऊं
बस तेरी ममता ही पाऊँ
हाथ थाम लेती थी हरदम
सपने में भी जब घबराऊँ
मैं रोया जब , तू भी रोई
हर छोटी बातों से विचलित
बस मेरे हँसने की खातिर
तूने भी सीखा मुस्काना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
हरदम मेरा साथ निभाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
हम चुपके से बड़े हो गए
माँ को धीरे धीरे भूले
पर माँ की बस यही कामना
मेरा बेटा तारे छू ले
उसकी बातों में , किस्सों में
केवल हम और हम ही हम हैं
हम अपनी व्यस्तता को रोयें
उसके पास न कोई बहाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
हरदम मेरा साथ निभाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
मैं घर से जब बाहर जाऊं
माँ बस दरवाज़े को तकती
जब तक घर वापस ना आऊँ
वो अपनी पलकें न झपकती
हम खोये अपनी दुनिया में
फुर्सत कहाँ जो माँ को देखें
माँ को बस चिंता इतनी सी
बेटे ने ना खाया खाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
हरदम मेरा साथ निभाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
माँ ने हमें बोलना सिखाया
हाथ पकड़ चलना सिखलाया
जीवन में जब व्यथित हुए हम
माँ के आँचल ने दुलराया
चाहे कितने बड़े हो गए
अब भी हम माँ के बच्चे हैं
माँ को अपने पास ही रखना
माँ तो है खुशियों का खजाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
हरदम मेरा साथ निभाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
माँ मैं तुझको कभी न भूलूँ
चाहे नभ के तारे छू लूं
तूने मुझको जनम दिया है
तेरी ही वाणी मैं बोलूँ
सारी दुनिया एक तरफ है
माँ मेरी है एक तरफ
तेरी सूरत मन मंदिर में
तुझमे मैंने ईश्वर जाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
हरदम मेरा साथ निभाना
माँ मेरी तू कभी न जाना !!
-डॉ. प्रदीप शुक्ल

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