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किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज ( यूनिवर्सिटी ): यादों के झरोखे से
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चार अक्टूबर सन उन्नीस सौ नवासी के ऐसे ही सुहाने दिन जब मैंने पहली बार " किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज " के कॉलेज वाले हिस्से में कदम रखा था, तब इस भव्य और विशाल प्रशासनिक भवन को देख कर उस दिन जो रोमांच मन में उभरा था, कमोबेश वही अनुभूति आज अपने बेटे के साथ फिर यहाँ आकर महसूस कर रहा हूँ. प्रशासनिक भवन की वही भव्यता अब तक बरकरार है. सफ़ेदी कुछ और चमकदार दिख रही है. हरियाली और फूल नि:संदेह पहले से ज्यादा हैं, और रखरखाव बेहतर.
समय किसी चिड़िया सा फुर्र से उड़ गया है. अभी कल की ही तो बात है, मैं कुछ कुछ गर्वित होता हुआ, कुछ कुछ घबराया हुआ सा इस मेडिकल कॉलेज के प्रांगण में पहली बार सत्ताईस नंबर की बस से उतरकर घुसा था. सी पी एम टी में अच्छी रैंक का खुमार अभी उतरा नहीं था. सामने से आते हुए सफाचट मूँछों वाले दो लड़कों से केवल प्रिंसिपल ऑफिस का पता ही नहीं पूँछा, बल्कि उन्हें ये भी बताया कि मैं यहाँ एम बी बी एस में एडमिशन लेने आया हूँ. बस फिर क्या था, अगले दस मिनटों में मेरी हालत चूहे जैसी हो गई थी और मैं दौड़कर AB ( Administrative Block ) के बिल में घुस जाना चाहता था.
डर वहाँ भी पीछा नहीं छोड़ रहा था. हृदयगति और ब्लड प्रेशर आसमान छू रहे थे. मेडिकल कर रहे रेजिडेंट डॉक्टर ने पहले तो जमकर सूता फ़िर समझाया कि, ' अबे तुझे खा थोड़े ही जायेंगे, मस्त रह.' यह सब वार्तालाप हो रहा था " ह्वाईट हाल " में, जहाँ पर हम एक साथ दस लड़के अपनी पैदाईशी अवस्था में नंग धडंग लाईन लगाकर खड़े थे. सामने गले में आला लटकाए आराम से समोसे खा रहे हमारे पूर्वज बी सी में मशगूल थे. ब्राउन हाल को पहली बार देखकर मुँह से बरबस ही निकल पड़ा था, " वाह! शानदार. " ह्वाईट हाल तो अब रहा नहीं पर ब्राउन हाल अपने पूरे आभामंडल के साथ अभी भी मौजूद है। आज ब्राउन हाल को देख कर लगा कि जैसे अभी अभी प्रोफेसर बी. के. खन्ना साहेब वासंती हाफ़ शर्ट और सफ़ेद पैंट पहने नमूदार होंगे और लगभग चिल्लाते हुए कहेंगे " दिस इज़ दि टर्निंग पॉइंट ऑफ़ योर लाइफ.......
लगभग पूरा दिन प्रवेश प्रक्रिया और मेडिकल में ही गुजरा था और दिन ख़त्म होते होते डॉक्टर बनने की ख़ुशी की जगह दिल में सीनियर्स का डर समा चुका था. तीसरी बटन देखते देखते गर्दन दुखने लगी थी. तीन नंबर, सात नंबर सलाम स्पाईनल रिफ्लेक्स से नियंत्रित होने लगे थे. हालत यह हो गई कि कॉलेज से दो किलोमीटर दूर भागकर घर के लिए चौराहे पर टेम्पो में सवार होने से पहले, रास्ते में सात राहगीरों को सात नंबर सलाम ठोंक चुका था.
- डॉ. प्रदीप शुक्ल
1989 बैच
किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ

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