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एक टीचर की याद
बात है अप्रैल १९९४ की. मैं तमाम तरह के अध्यापकों से बावस्ता होता हुआ एमबीबीएस के फाईनल ईयर का इम्तेहान दे रहा था. मेडिकल कॉलेज में एक से बढ़कर एक टॉपर फाईनल ईयर में पानी मांगने लगते हैं, यह बात जग जाहिर है. मैं भी अपने को कोई कम तीसमार खां नहीं समझता था. अब तक किसी परीक्षा ( एमबीबीएस की, वरना तो अपुन सारे रिकार्ड ध्वस्त कर मेडिकल कॉलेज में घुसा था ) में सप्ली नहीं लगी थी, पर मेरी भी हालत इम्तेहान के दौरान तीर से बचते खरगोश की हो रही थी.
फाईनल ईयर में हमारे जमाने में बहुत भारी कोर्स हुआ करता. अब कुछ कम कर दिया गया है. इतनी सारी सूचनाएं बहुत कम समय में ठूंस-ठूंस कर भर ली जातीं थीं कि सब आपस में गड्डमगड्ड हो जातीं. दिमाग की संदूक से एक सूचना निकालिए चार उसके साथ टपक जातीं.
ईएनटी यानी नाक-कान-गला विभाग सप्ली के लिए कुख्यात था. छोटा विषय होने के नाते उसे लोग समय भी कम देते. हर साल १८५ के बैच में ५० सप्ली तो तय थीं, कभी संख्या और ज्यादा हो जाती. मेरा आखिरी वायवा इसी विभाग में था. बकिया सब संतोषजनक निपट गए थे, मतलब कोई ब्लंडर नहीं उछला था. सबमे पास होने की पूरी उम्मीद थी.
इस विभाग में सेकेण्ड टू हेड, शुक्ला जी आल टाइम खतरनाक माने जाते थे. महीने भर की उनकी क्लीनिक में आधे समय हम लोग गालियाँ सुनाकर धकिया दिए जाते. हालांकि बहुत अच्छा पढ़ाते और विद्वान् आदमी थे/हैं, पर हमी लोग बहुत अनुशासित नहीं थे या ईएनटी विषय पर बहुत ध्यान नही देते.
वायवा चल रहा था और सबको शुक्ला सर के पास से गुजरना था. उनके सामने पैर कंपकंपाना और हकलाना आम बात थी. आज तो फेल-पास का सवाल था.
पहुँचते ही सवालों का सिलसिला शुरू हुआ. हम काफी ठीक जा रहे थे कि उन्होंने औजारों के एक बड़े ढेर की तरफ इशारा किया. एडिन्वायड्स के ऑपरेशन के लिए क्रमवार औजार निकाल कर रखने थे, रख दिया. उस दौरान सर्जरी, ईएनटी, ओफ्थाल्मिक्स के मिलाकर हजारों की संख्या में अजीब-अजीब नामों वाले बहुत छोटे-बड़े औजार कंठस्थ थे. मुश्किल काम था, लेकिन लगभग सभी लोग पारंगत हुआ करते.
खैर, वायवा अब एडिन्वायड्स ( गले के अन्दर गाठें ) पर होने लगा. शुक्ला सर ने पूछा, अगर ऑपरेशन न करें तो क्या होगा? मैंने गिनाना शुरू किया -
- सर, एडिन्वायड फ़ेसीज़ हो जायेंगे.
- क्या होता है, इसमें?
- सर, बच्चा मुंह से सांस लेता है तो चेहरा आगे निकल आता है.
- और
- सर, दांत तिरछे हो जायेंगे
- और
- सर, हाई आर्चेड पैलेट
- और
- सर दिन में बच्चा सोयेगा क्योंकि रात में उसकी नींद नहीं पूरी हुई. मैं एक ही बात को घुमा घुमा कर बताये जा रहा था. आगे और कुछ समझ ही नहीं आ रहा था.
टीचर और- और तब तक कहता रहता है जब तक जो बात उसके दिमाग है, वह नहीं निकलती.
- अबे, और कुछ बताएगा कि यहीं अटका रहेगा
उनके बगल में बैठा मेरा सीनियर जो उनका चीफ़ रेज़ीडेंट था, ने कान की तरफ इशारा कर के मेरी सहायता करनी चाही. पर तब तक मेरा सारा एड्रिनालिन बाहर आकर तांडव कर रहा था. दिमाग के अन्दर लाखों कनेक्शन में केमिकल लोचा हो रहा था. जो सबसे कॉमन कॉम्प्लीकेशन था, रिकरेन्ट ओटिटिस मीडिया यानी मध्य कान में बार-बार संक्रमण, वह हमने नहीं बताया. चीफ रेज़ीडेंट के इशारे के बाद भी नहीं बताया. इसे सबसे पहले मुझे बताना चाहिए था.
शुक्ला सर की भौंए तन चुकी थीं और मेरे माथे पर पसीना चुचुहा आया था. तभी पता नहीं किस कनेक्शन में बिजली जली और मैंने झट से कहा
- सर, कार पल्मोनेल
- क्या?
- सर कार पल्मोनेल, हार्ट फेल्योर
शुक्ला सर ने हाथ बांधकर, कुर्सी पर तन कर, तने हुए चेहरे से सपाट स्वर में फिर पूछा.
- माने एडिन्वायड्स नहीं निकालोगे तो हार्ट फेल्योर हो जाएगा?
अब तक मैं स्थिति की गंभीरता को पढ़ने लगा था.
- मैं मिमियाया
- कहाँ पढ़ा तुमने?
- सर, अग्रवाल सर ने पढ़ाया था क्लीनिक में.
- लाओ, दिखाओ नोट्स
उन्होंने बगल वाले चीफ़ रेज़ीडेंट को घूरा
- क्यों भाई, तुमने पढ़ा है ये?
उन्होंने अपने बॉस की मुखमुद्रा को देखते हुए तुरंत खोपड़ी ना में हिला दी. मैं अब फंस चुका था. मैंने तुरंत पैतरा बदला.
- सर, वो गलती से कुछ और समझ लिया होगा, सॉरी. सॉरी सर.
अरे, तुमने तो उसका हार्ट फेल्योर करा दिया. मतलब तुमने कैसे सोचा ये?
- सर, गलती से बोल दिया, सॉरी.
- गलती क्या? फाईनल ईयर में तुम इतना बड़ा ब्लंडर कैसे कर सकते हो?
शुक्ला सर मेरे नाम के आगे पेन चला कर बोले, बेटा पहले हमको यह लिखा दिखाओ कहीं पर नहीं तो मैंने तुम्हे पंद्रह में जीरो दिया है. पास तो तुम होने से रहे.
मेरा सारा केमिकल लोचा शांत हो चुका था. आँखों के आगे अन्धेरा पसरने लगा था. मैंने आखिरी कोशिश की.
सर के पैर पकड़ कर रिरियाया.
- सर, माफ़ कर दीजिये, गलती से बोल गया.
- चलो, जाओ हमें कहीं लिखा हुआ दिखाओ. कर ले गए तो पंद्रह में पंद्रह दूंगा नहीं तो जीरो तो मिला ही है. बस, निकल लो यहाँ से.
मैं अपने आपको घसीटता हुआ कमरे के बाहर ले गया. बाहर बेंच पर कुछ मिनट अचेत बैठा रहा. फिर धीरे-धीरे चेतना वापस लौटी तो आंसू झरने लगे. जैसे मैं आसमान से सीधा धरती पर आ गिरा था. कोई खजूर भी रास्ते में मेरे लिए नही खडा था.
थोड़ा संभला तो लगा कुछ किया जाए. अपनी याददास्त पर भरोसा सा उठने लगा. फिर अग्रवाल सर की पूरी क्लास याद आ गई. बिलकुल उन्होंने ऐसा कहा था. मैं एप्रन समेटता हुआ तुरंत अग्रवाल सर के पास भागा. पर इतना आसान कहाँ था बिगड़ी किस्मत संवारना. अग्रवाल सर आज छुट्टी पर थे. मोबाईल का ज़माना नहीं था. उनके घर जाने में देर होती.
मैंने सोचा, अगर अग्रवाल सर ने पढ़ाया था तो किसी पुस्तक में भी लिखा जरूर होगा. मैं लाईब्रेरी की तरफ दौड़ा.
भगवान् मेरे साथ था. बढ़िया सुन्दर अक्षरों में वही बात लिखी थी, जो अग्रवाल सर ने अपनी क्लीनिक में हमें बताया था और जिसे मैं गलती से शुक्ला सर के आगे उगल आया था. यानी कि बहुत समय तक सांस में अवरोध के चलते हार्ट फेल्योर हो सकता है.
इश्यू कराने का समय किसके पास था. पतली सी किताब थी पी एल धींगरा की. पेंट में खोंसी और बिजली की गति से दौड़ता हुआ विभाग मे हाजिर हो गया. अन्दर शुक्ला सर किसी और का वायवा ले रहे थे. मैंने किसी का इंतज़ार नहीं किया. किताब लेकर सीधा उनके आँखों के सामने कर दी. पहले तो मेरी इस उद्दंडता पर वह चिल्लाने को हुए पर शायद उनको भी बात समझ आ गई.
वह पैराग्राफ पढ़ कर उन्होंने चश्मे के ऊपर मुझे घूरा. पूछा किसने लिखी है यह बुक?
- सर, पी एल धींगरा
- हूँ, धींगरा साहब तो ठीक आदमी हैं. रेजीडेंट की तरफ देखते हुए बोले.
फिर बिना मेरी तरफ देखे हुए उन्होंने पंद्रह नंबर चढ़ाए.
मैं कुलाचें भरता हुआ विभाग से बाहर निकल आया.
- प्रदीप कुमार शुक्ल

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