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गांव का एक लड़का ( 29 )



जब कानपुर मेडिकल कॉलेज में डी फार्मा कोर्स में प्रवेश लिया तो कोचिंग के साथ लालकुआं वाला कमरा भी छूट गया और लाल साब के यहाँ का ट्यूशन भी. लेकिन लखनऊ की आदत इतनी पड़ गई थी कि लखनऊ नहीं छूट सका. उसी समय कानपुर रोड, लखनऊ में एक नई एलडीए कॉलोनी विकसित हो रही थी. जिसमे एक कमरे वाले एलआईजी मकान के लिए पिताजी ने पहले आवेदन किया था, जो अब एलाट हो गया था. जिसका गृह प्रवेश मैंने और बुआ जी ने मिलकर कर डाला. मैं नहा धो कर पंडित बन गया, बुआजी यजमान. आम की लकडियाँ इकट्ठा कर उसमें हवन सामग्री और घी डालकर दो चार बार ओम - ओम कर लिया. मैंने कुकर में छोले उबाल दिए, बुआ जी ने साथ लाई कढ़ाई में पूरियां तल दीं, हो गया गृह प्रवेश. जैसा गृह वैसा प्रवेश.
नए घर में शहर की कम, गाँव की फीलिंग ज्यादा थी. कच्ची सड़कें, आधी - अधूरी सीवर लाइन के चलते दिशा मैदान बाहर ही जाना होता. आसपास गाँव, खेत. लेकिन लालकुआं के उस अँधेरे कुएं से लाख बेहतर था. चारबाग स्टेशन से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह एक कमरे का मकान अब गाँव से और नजदीक आ गया था. मेरा स्थाई पता अब यही था.
कानपुर मेडिकल कॉलेज में बाकायदा मेडिकल हुआ, रैगिंग हुई, मूछें सफाचट हुईं और पढाई लिखाई शुरू हो गई. कुल एक सौ बीस लोगों का बैच था. वहीं कैम्पस में ही हॉस्टल, पर लखनऊ के मोह ने हॉस्टल में नहीं रहने दिया. गोमती एक्सप्रेस सुबह पांच बजे ( शायद ) लखनऊ से चलती और शाम को पांच बजे कानपुर से लखनऊ को. एमएसटी बनवा लिया और डेली अप डाउन करने लगा.
हमारा बी एससी का पूरा गुच्छा आलमबाग के इलाके में दो कमरों में रह रहा था. उसमे से अमरनाथ और सिराज भाई तो कोचिंग में ही थे. लाला की बी एससी कम्प्लीट हो चुकी थी और वह प्रतियोगिता दर्पण पढता हुआ तमाम कम्पटीशन - कम्पटीशन खेलने में जुट गया था. हमारे ग्रुप का सबसे बुद्धिमान बालक प्रमेन्द्र मिश्रा बी एससी द्वितीय वर्ष में था और पीएमटी के खेल में न फँसकर पीसीएस / आईएएस के मकड़जाल में खुद को फँसाने के लिए इलाहाबाद की तैयारी में था.
कानपुर से लौटते समय मेरा पहला ठीहा यहीं होता. वहाँ कोचिंग के नोट्स देखकर दिल में अजीब सा दर्द उठता. लेकिन अब किया ही क्या जा सकता था, भाग्य ने मंजिल तय कर दी थी. पढने की आदत लग गई थी सो फार्मेसी की पतली - पतली किताबें पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं थी. पर सच पूछा जाय तो ये किताबें पढ़ने में मन बिलकुल नहीं लगता.
मेडिकल कॉलेज के जिस एलटी - 1 में मेरी कक्षाएं लगतीं उसी में एमबीबीएस वाले बच्चे भी पढ़ते. मेरी तरह ही डे स्कॉलर था मेरा दोस्त कमलाकांत राय. हम और कमलाकांत वहीं मैदान में एक छोटी सी पुलिया पर बैठ कर अक्सर बतियाते. वह भी बीएससी कर के डिप्लोमा के लिए आया था. पढ़ने में ठीक - ठाक था. वह मुझे रोज अपनी साइकिल से रेलवे स्टेशन तक छोड़ता. उसके भाई शायद गन फैक्ट्री में काम करते थे और वहीं उसका डेरा था. कुल मिलाकर वही मेरा वहाँ पर घनिष्ट मित्र था.
पुलिया पर बैठे - बैठे हम दोनों अक्सर एमबीबीएस वाले बच्चों को देखते रहते. हमें उनके चेहरे चमकदार और अपने बुझे हुए दिखाई देते. दरअसल मेरे अन्दर हीनता की ग्रंथि पैर पसारने लगी थी. मैं अक्सर कमलाकांत से कहता, यार ये सब डॉ बन जायेंगे और हम तुम फार्मासिस्ट ही रह जायेंगे. जबकि हम भी मेहनत कर सकते थे और हमें भी यह सौभाग्य मिल सकता था. कमलाकांत झट से बोल पड़ता, यानी फार्मासिस्ट होना बुरा काम है? नहीं, मैंने ऐसा कब कहा? मैं ठंडी सांस खींच कर जवाब देता. कमलाकांत कहता, ठीक है यार ये कम्प्लीट हो जाए तो हम भी तैयारी करेंगे. मैं कहता, तुम्हे भी पता है यार ऐसा नहीं होने वाला. पढाई पूरी करते ही छः महीने की इंटर्नशिप, फिर नौकरी. नौकरी लगते ही घरवाले शादी कराने के लिए उतारू हो जायेंगे. फिर हो चुकी तैयारी. कुछ करना है तो अभी करना है. अभी नहीं तो फिर कभी नहीं.
दो - तीन महीने बाद शुरू हुई यह बहस फिर अक्सर होने लगी. धीरे - धीरे समय गुजरता रहा और छः महीने गुजर गए. पहला सेमेस्टर एक्ज़ाम हुआ जो मैंने आसानी से और अच्छे नंबरों से पास कर लिया.
फिर एक दिन पुलिया पर बहस छिड़ी. कमलाकांत ने आखिर जान बचाने के लिए कहा, यार छोड़ तो दूं पर मेरे घर वाले बिलकुल नहीं मानेंगे. मैंने कहा मानेंगे तो मेरे घर वाले भी नहीं पर मैं तो वही करूंगा जो फाइनली मेरा मन कहेगा. कहने को तो कह रहा था पर फाइनली मैं अपने मन को ही मनवा पाऊंगा, इस पर मुझे शक था.
अब यह कसमकस चौबीसों घंटे मेरे दिमाग में चलने लगी. इसी उधेड़बुन में एक दिन मैं अपने पुराने केकेसी कॉलेज पहुँच गया. दोपहर के ग्यारह बज रहे होंगे और जूलोजी विभाग के गलियारे में गोपाल कृष्ण चक्रवर्ती सर खड़े हुए सिगरेट फूंक रहे थे. चक्रवर्ती सर मुझे कोचिंग में वर्टीब्रेट जूलोजी पढ़ाते थे. मैंने झुक कर उनके पैर छुए और हाथ बाँध कर खड़ा हो गया.
मुझे देखते ही वह बोले, अरे ! तुम यहाँ कैसे? तुम तो पढने में बहुत अच्छे थे फिर कोचिंग क्यों छोड़ दी? मैंने सारा किस्सा संछेप में उन्हें बताया. तो, अब क्या परेशानी है? चक्रवर्ती सर ने मुहं उठाकर धुंआ ऊपर फूंकते हुए पूछा. सर, मेरा मन वहाँ नहीं लग रहा है, मेरी आवाज में दुःख और निराशा के गहरे भाव थे. थोड़ी देर तक चक्रवर्ती सर मुझे घूरते रहे फिर उन्होंने जलती हुई सिगरेट फेंककर जूते से मसली और बोले. बाबूजी, ( बाबूजी उनका तकिया कलाम था, हर दूसरा वाक्य वह बाबूजी से ही शुरू करते ) तुम छोड़ो ये फार्मेसी - वार्मेसी. मैं लिख कर दे सकता हूँ की तुम्हारा सलेक्शन हो जाएगा, कोई रोक नहीं सकता.
एक झटके से मेरी आँखों के आगे का जाला साफ़ हो चुका था. द्रोणाचार्य ललकार उठे थे और अब मुझे सामने सिर्फ और सिर्फ चिड़िया की आँख नज़र आ रही थी.
जारी है ......

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