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गांव का एक लड़का ( 23 )



लाल साहब के तीन छोटे - छोटे बच्चे थे l सब प्राइमरी सेक्शन में, जिन्हें पढ़ाना आसान था l जिंदगी भी कुछ आसान हो चली थी l लाल साहब का उस दौर में बहुत सहारा रहा l अगर वह मुझे पीडब्ल्यूडी की नौकरी की तरफ मोड़ देते तो शायद जीवन कुछ और ही होता l श्रीमती लाल एक बहुत ही भली और उदार महिला थीं l अब वह इस दुनिया में नहीं हैं l ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे l मास्साब को कभी केवल चाय से नहीं टरका दिया गया l हमेशा चाय के साथ कुछ खाने के लिए जरूर होता l बच्चों को पढ़ाने का मतलब मैंने बस डांट - डपट और मारपीट ही सीखा था l उसका भरपूर उपयोग उन नन्हे बच्चों पर मैं भी खूब करता था l अब सोचता हूँ तो खुद अपने आप पर बहुत शर्म आती है l इतने छोटे बच्चों को पढाई के नाम पर कोई कैसे मार सकता है? जब मारपीट ज्यादा हो जाती, तो भाभीजी बस इतना कहतीं, ' मास्साब, सिर के पीछे मत मारा कीजिए, दिमाग पर चोट लग सकती है l' आजकल मास्साब लोग इस तरह करें तो अगले दिन से बाहर हो जाएँ l
साल पूरा हुआ और वार्षिक परीक्षाओं में मैं पचास प्रतिशत से ऊपर नंबरों से तीनो विषयों में पास हो गया l अब बी एससी द्वितीय वर्ष की कक्षाएं आरम्भ हो गईं l हमारी तरह गाँव - कस्बे की पृष्ठभूमि वाले कई लड़के खूब अच्छे दोस्त बन गए l अमरनाथ मिश्रा, प्रमेन्द्र मिश्रा, सिराजुद्दीन अहमद ( सिराज भाई ), रामेन्द्र श्रीवास्तव ( लाला ) l हम पांच लोगों की दोस्ती गहरी हो गई l सभी निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के, सभी का हाथ अंग्रेजी में तंग l
हमारी मित्र मंडली में एक दीक्षित नाम का लड़का हुआ करता था, उसका मूल नाम भूल रहा हूँ. केमिस्ट्री की लैब में कोई सल्यूशन दीक्षित से कॉपी पर गिर गया था. तभी वहाँ विभागाध्यक्ष प्रकट हो गए. देखते ही दीक्षित के मुँह से निकला, " सर, ढरक गवा रहै " फिर तो सर ने जो उसकी क्लास लगाईं कि वह आँसुओं से रो दिया. जाहिल, गंवार, बेवकूफ आदि अनेकानेक उपाधियों से नवाजा गया उसे. अब पूरा क्लास दीक्षित को ' ढरक गवा ' के नाम से बुलाने लग गया. कुछ दिनों बाद उसने कॉलेज आना ही बंद कर दिया l
एक थे दयाशंकर पांडे l पांडे जी जब देखो तब हमारी मंडली में घुस कर चाय पी जाएँ और पैसे कभी न दें l इस बात को महीनों गुजर गए l एक दिन हम लोगों ने चाय वाले से कह कर पांडे जी को फंसा दिया l हम चाय पीने के लिए जैसे खड़े हुए, पांडे जी आ गए l फिर हमने वहाँ जो भी दिखाई दिया सबको बुला लिया चाय के लिए l पांडे जी को सबसे बाद में गरम कुल्हड़ में चाय परोसी गई l जब तक उनकी चाय ठंडी होती तब तक हम सब चाय पीकर निकल चुके थे l आखिरी बन्दे ने चिल्लाकर कहा, ' आज के पैसे दयाशंकर पांडे देंगे l ' पांडे जी जब तक कुछ समझते - समझते हम सब नौ दो ग्यारह हो चुके थे l काफी देर तक जब पांडे दिखाई नहीं पड़े तो पता चला कि पांडे जी चाय की दूकान पर खड़े रो रहे हैं l उनकी जेब में एक भी पैसा नहीं था l शायद उसी दिन नहीं रहा होगा या रोज ही नहीं रहता होगा l पांडे जी का चेहरा शर्म से लाल l मुझे बाद में इसका पछतावा हुआ l हम लोगों ने पैसे चुकता किये और पांडे जी को छुड़ा लाये l पर उसके बाद फिर कभी कहने पर भी दयाशंकर पांडे हम लोगों के साथ चाय पीने नहीं गए l
जारी है ......

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