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गांव का एक लड़का ( 20 )



यह सिलसिला लगभग ढाई महीने तक चला l शाम को सात - आठ बजे खाना खा कर घर लौटता l पूरा दिन पेटियां ढोने के बाद रात में कुछ होश नहीं रहता l सुबह उठकर फिर नौकरी पर l धीरे - धीरे मन ऊबने लगा l सोचता कि क्या यही करना है मुझे जीवन भर? अन्दर से आवाज आती, नहीं l पर करना क्या है? यह आवाज न अन्दर से आती न बाहर से l
फिर एक दिन पेपर में रिज़ल्ट आ गया बारहवीं का l मैं फिर से थर्ड डिवीज़न में पास था l इस बार सुपर बैड थर्ड डिवीज़न थी l नंबर थे 39 प्रतिशत l
इधर नौकरी से मैं भी भर पाया था और पिताजी का गुस्सा भी शांत हो चुका था l हमारा सारा क्रोध तो खैर पसीने के रास्ते शरीर से बह ही गया था l तो, तय हुआ कि अब नौकरी नहीं होगी, आगे पढ़ाई की जायेगी l यह सब तय किसी कमेटी ने नहीं किया l बस रात में सोने से पहले बिस्तर पर लेटे तारे निहारते - निहारते अंतरात्मा ने चुपचाप बोला और हमने चुपचाप सुन लिया l अगली सुबह बस स्तीफे की तैयारी l मैं अपनी तरफ से कुछ कहता सुनता कि मेरे मैनेजर ने मालिक को पहले ही जड़ दिया कि नया लड़का नौकरी छोड़ने के मूड में है l
नौकरी छोड़ने की बात पर मालिक ने बस इतना ही कहा कि, " यार तुम्हे नौकरी करनी ही नहीं थी तो क्यों आए यहाँ l अब जाकर तो तुम कुछ काम सीख पाए थे, अब किसी और को सिखाऊँ l खैर, तुम्हे आगे पढ़ना है तो जरूर पढ़ो, मैं तुम्हे पढने से नहीं रोकूंगा l" उन्होंने मेरा हिसाब किताब कर पैसे दिए, मैंने उनको धन्यवाद दिया l अभी कुछ साल पहले एक दिन एअरपोर्ट पर वही मालिक मुझे मिल गए l वह तो मुझे क्या पहचानते पर मैं उन्हें पहचान गया l उन्हें बताया तो वह बहुत खुश हुए l
लेकिन उस समय मेरे पढ़े लिखे रिश्तेदारों और आवारा दोस्तों ने यही सलाह दी कि अभी चेत जाओ l बी ए में नाम लिखाओ l जो डब्बा ढोने की नौकरी कर रहे हो तीन सौ रुपये महीने की, उसमे आगे प्रबल संभावनाएं हैं l हमारे घर में प्रायः इस तरह की बातों पर किसी तरह का संवाद नहीं होता था l एक परम्परा सी थी जिसका निर्वाह मनोयोग से किया जाता l घर से पैसे मत मांगो, जो चाहो सो करो l
अब मन में किसी तरह की दुविधा नहीं थी l बी एससी ही करनी थी l इंटर के बाद सब यही करते थे l सीपीएमटी, मेडिकल कॉलेज के बारे तो कुछ अता पता ही नहीं था l तब तक पिताजी का एलान भी समय के साथ बह गया था l जेब खर्च के लिए ट्यूशन नाम की गाय पालने का विचार हो चुका था l पर सवाल इस बात का था कि भइये, 39 प्रतिशत वाले प्रखर बुद्धि धारक बालक को कौन कॉलेज दाखिला दे? कान्यकुब्ज कॉलेज से पास होकर उसी कॉलेज के डिग्री सेक्शन में जाने पर यहाँ भी मेरे लिए 10 प्रतिशत नंबरों की कृपा मौजूद थी l जा को राखे सईयाँ ....
रो - धो कर ( एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि एडमीशन नहीं हो पायेगा और मैं बाकायदा आँसू बहा कर रोने लगा था ) बी एससी में दाखिला तो हो गया पर यहाँ तो एक दूसरी ही समस्या मुंह बाए खड़ी थी l अवधी मिश्रित हिन्दी में सोचने, बोलने वाले बालक को धाराप्रवाह फिरंगी भाषा समझना और लिखना असंभव के निकट था l ( नोट किया जाय कि गांव से आने के पश्चात पूरे दो वर्षों तक बालक लखनऊ के सभी छविग्रहों में जाकर हिन्दी फिल्मों पर सघन शोध कर रहा था l बालक शोधकार्य लिखना शुरू करता कि इलाहाबाद बोर्ड ने इंटर परीक्षा का टाइम टेबल घोषित कर दिया था ) वर्षांत तक तो हिन्दी - अंग्रेजी का तर्जुमा ही चलता रहा l अब जब सालाना परीक्षा की स्कीम नोटिस बोर्ड पर चस्पा हो गई तो फिर हिन्दी की ही शरण में जाना उचित समझा गया l
जारी है ......

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