सोने की घंटी
हरी मखमली चादर लिपटी
जैसे हो सोने की घंटी
या फिर कहीं लॉन के ऊपर
मुँह लटकाए बैठा बंटी
जैसे हो सोने की घंटी
या फिर कहीं लॉन के ऊपर
मुँह लटकाए बैठा बंटी
पियरी ओढ़े नई दुल्हनिया
झाँक रही खिड़की से नीचे
पीताम्बर लपेट कर जोगी
ध्यानमग्न हो आँखें मीचे
झाँक रही खिड़की से नीचे
पीताम्बर लपेट कर जोगी
ध्यानमग्न हो आँखें मीचे
गोद मचल कर लटक रहे हों
जैसे बच्चे कहीं हठीले
अरे! नहीं ये तो कनेर के
फूल खिल रहे सुन्दर पीले.
जैसे बच्चे कहीं हठीले
अरे! नहीं ये तो कनेर के
फूल खिल रहे सुन्दर पीले.
- प्रदीप शुक्ल
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