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गांव का एक लड़का ( 5 )


बगल के गाँव से खिन्नी काका खेती में काम बंटाने के लिए आते l थोड़े ठिमके से खिन्नी काका के जुड़वां भाई थे रम्मा काका l दोनों को अलग - अलग पहचानना बहुत मुश्किल हो जाता l पचास पार खिन्नी काका सारे काम बहुत धीरे - धीरे करते l खेत जोतने को छोड़ दें तो हम सब खिन्नी काका के साथ ही लगे रहते l चारा काटने की मशीन पर तो रोज ही मुलाक़ात होती l हरा मुलायम चारा तो आसानी से एक आदमी ही काट लेता पर ज्वार और बाजरे के मजबूत सूखी लकड़ी हो चुके गट्ठर को काटना बहुत मेहनत का काम होता l खिन्नी काका अक्सर डंडा पकड़ने से बचते रहते l पनारा पकड़ कर खड़े हो जाते कि जवान लड़के हो तुम लोग मेहनत कर लो अभी नहीं तो जल्दी बुढा जाओगे l खुद चारा मशीन में डालते रहते और हम लोग आँख बंद कर मशीन चलाते रहते l आँख इसलिए बंद करनी होती कि अक्सर छोटे - छोटे टुकड़े निकल कर सीधा नाक, कान, आँख पर अटैक कर रहे होते l जाड़े के अंत में जब भूसा और चारा ख़त्म हो जाता तो धान का पैरा मशीन से काटा जाता l सूखा पैरा काटने पर खूब महीन भूसा नाक मुहँ में घुस जाता l

आषाढ़ के तीखे घाम में खिन्नी काका हल बैल लेकर चौमासे में पहुँच जाते l वे बेचारे चिलचिलाती धूप में कैसे दोपहर तक जुताई करते होंगे, इसका अहसास नहीं था तब हमें l हमें तो बस इतनी परेशानी थी कि उनका नाश्ता लेकर दस बजे खेत पर पहुंचना होता l एक हाथ में पाराठे, गुड़, नमक की पोटली दूसरे हाथ में पानी की बाल्टी l कभी - कभी खेत की दूरी दो किलोमीटर से भी ज्यादा होती l जब वह नाश्ता कर रहे होते तब मैं हल चलाने की कोशिश करता पर कभी सीख नहीं पाया l दरअसल देखने में जितना आसान लगता था उतना आसान था नहीं फाल को सीधा रख पाना l एक बार इसी कोशिश में बैल को लोहे की फाल से चोट भी लग गई थी l

घर में हमेशा एक जोड़ी बैल, कम से कम एक गाय, एक भैंस और 2 - 3 गाय भैंस के बच्चे हम मनुष्यों के साथ घुल मिलकर रहते l ये सब भी हमारे वृहत्तर परिवार का हिस्सा थे l एक श्यामा गाय हमारे जन्म के दिन ही पैदा हुई l जब हम उसे चराने लायक हुए तब तक वह बूढ़ी हो गई और हमारे देखते - देखते इस संसार से विदा हो गई l कई दिनों तक मन बहुत दुखी रहा, मेरा उससे ख़ास लगाव था l

बच्चों के लिए काम उनकी उम्र के हिसाब से तय होते थे. शुरुआत होती थी गाय भैंसें चराने से. फिर गोबर हटाना, सफाई करना, हलवाहे को खेत पर कलेवा पानी ले जाना, सिर पर गेंहूँ की बोरी लादकर दूर चक्की से पिसवाकर लाना, पम्पिंग सेट जिसे गाँव में ' इंजन ' कहते हैं, बैलगाड़ी पर चढ़ाकर खेत में बोरिंग पर ले जाना, गेंहूँ के खेत में पानी लगाना, धान की बेढ लगाना, गेंहूँ काटना, गेंहूँ के बोझ खेत से सिर पर लादकर या बैलगाड़ी से लादकर खलिहान में इकट्ठा करना, मड़नी माड़ना, भूसा और अनाज घर लाना आदि आदि l कब आप खेलते - खेलते चौबीस घंटे के मजदूर बन जाते आपको पता ही नहीं चलता l

खेती के बहुत सारे काम पहले सीखने होते l मसलन घास छीलना आसान काम नहीं है l इसमें बहुत तजुर्बे और धैर्य की आवश्यकता होती है. थोड़ी सी गलती से खुरपी आपकी ऊँगली काट सकती है l खेती से सम्बंधित कार्यों के सीखने के साथ साथ बच्चों को कुछ व्यक्तिगत कौशल भी विकसित करने होते थे, जिनके लिए घर से समय और सहमति नहीं होती थी. जैसे गर्मी की दोपहर में बिना आवाज किये साइकिल निकाल ले जाना. अब साइकिल सीखने में चोटें आना और साइकिल में कुछ खराबी आ जाना स्वाभाविक है, तो सीखने की एवज में हर बच्चा डांट खाने के लिए तो मन बना कर ही रखता था l मैंने गाँव में किसी बच्चे के माता पिता को उसे साइकिल चलाना सिखाते हुए नहीं देखा. हाँ इसके लिए मार खाते जरूर देखा है और खुद भी खाई है l डांट खाना या मार खाना इस बात पर निर्भर करता कि साइकिल स्वामी का उस समय मूड कैसा है l इसी तरह पेंड़ पर चढ़ना, तालाब में तैरना, गहरे बड़े तालाब को तैर कर पार करना, डुबकी लगाकर पानी के नीचे नीचे तैरना आदि कुछ ऐसे कौशल थे जिसके लिए किसी नाजुक समय में आपका भाई या दोस्त चुगली कर आपको मार खिलवा सकता था l

एक बार एक जामुन के पेंड़ पर चढ़कर हम दो दोस्त जामुन तोड़ रहे थे. जामुन की वह डाल हालाँकि काफी मोटी दिख रही थी परन्तु अचानक उस डाल ने पेंड़ का तना छोड़ा और जब तक हम लोग सँभलते सँभलते, करीब 20 फीट ऊपर से डाल सहित दोनों जमीन पर थे. बहुत गंभीर चोटें नहीं थीं, हाँथ पैर छिल जाना, कपड़े फट जाना मामूली बातें थीं, घर से छिपाई जा सकतीं थीं. बहुत बाद में मैं जब मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था तो देखा कि पैराप्लीजिया वार्ड में अस्सी प्रतिशत नौजवान और बच्चे जामुन के पेंड़ की वजह से अपने दोनों पैर जिंदगी भर के लिए खो चुके थे l तब पता चला कि हमारे माता पिता हमें पेंड़ पर चढ़ने से क्यों रोकते थे l

पेंड़ पर चढ़ने वाला एक और खेल हम लोगों को बहुत प्रिय था, जिसे हम लोग ' टुक्का ' कहते थे l इसके लिए एक छोटा जामुन का पेंड़ निर्धारित था. पेंड़ थोड़ा झुका हुआ था, जिस पर चढ़ना आसान रहता l डालें जमीन से बहुत दूरी पर नहीं थीं और जमीन पर आराम से कूदा जा सकता था l खेल में तेजी से पेंड़ पर चढ़ना, एक डाल से दूसरी डाल पर छलांग लगाना, ऊपर से जमीन पर कूदना सम्मिलित था. घर से इस खेल के लिए बिल्कुल इजाजत नहीं थी और पकड़े जाने पर खूब डांट पड़ती थी l एक बार इसी खेल में भाई को ठुड्डी में एक कंकड़ का टुकड़ा लगा और गहरा घाव बन गया. जाहिर है घर में चोट का कुछ और बहाना बनाया गया, पर इसे लेकर भाई को मैंने बहुत दिनों तक ब्लैकमेल किया l

जारी है .......

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