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गांव का एक लड़का ( 4 )



सन्डे को खेती के कामों से उसी को थोड़ी राहत मिलती जिसे इतवारी बाजार की जिम्मेदारी मिलती l हालांकि वहाँ भी झंझट कम नहीं थे l पर उसमें थोड़े पैसे बनाने का भी लालच रहता l आप तो जानते ही हैं कि पैसे का लालच दुनियादारी सीखने के साथ आपसे चिपक लेता है l तो हम भला कैसे अछूते रहते l घर से गेहूं, अरहर, मूंगफली, दाल आदि ले जाते उसे बाजार में बेंचते फिर पूरे हफ्ते का सामान उन्ही पैसों से खरीदा जाता l अक्सर इसके लिए बैलगाड़ी ही इस्तेमाल होती, नहीं तो साईकिल जिंदाबाद l आनाज के मूल्य में हेरफेर करना बेईमानी होती सो उसमे कोई पैसा नहीं बचता l सब्जियों की ख़रीद में जम कर मोलभाव करते और चवन्नी - अठन्नी तो बचा ही लेते और ईमानदारी की भावना भी बची रहती l कभी - कभी हिसाब किताब में पैसे कम पड़ जाते तो मजबूरी में चीजों के दाम बढाकर लिख तो लेते पर कई दिनों तक घबराहट बनी रहती l

वाहन के रूप में हमारे पास एक MPV ( मल्टी परपज़ वेहिकिल ) हुआ करता l जिसे हम कभी SUV की तरह इस्तेमाल करते तो कभी मालगाड़ी की तरह l दरअसल बड़ी बैलगाड़ी जो केवल सामान लादने के कार्यों के लिए ही बनाई जाती उसे हम ' गाड़ी ' कहते l छोटी MPV को हमारे यहाँ ' रब्बा ' कहा जाता l रब्बा हल्का होता तब भी मतलब भर के लोग और सामान उसमे ढोया जा सकता था l

खेती किसानी में बैलगाड़ी हाथ - पाँव तो थी ही बाक़ी बहुत सारे काम इसी से संपन्न होते l रिश्तेदारी में जाना, स्टेशन से सवारी लाना, बाजार, मेला और बारात l बारात और मेले का हम बच्चों को हमेशा इंतज़ार रहता l महीनों पहले से तैयारियां होतीं l

बाबा के साथ दीवाली के बाद वाले हटिया मेला में जाने की यादें हमारे बचपन की कुछ बेहद सघन यादों में हैं l उस मेले की यादें इतनी चमकदार हैं कि उसकी हर एक छोटी - छोटी बात बिलकुल शीशे की तरह साफ़ दिखाई पड़ती है l लगता है कि अभी कल की ही तो बात है l एक दिन पहले बैलों को नहला कर उन्हें खरहरा कर चमका देते l सींगों पर तेल और कालिख लगाते छोटी - छोटी घंटियों से सजे पट्टे बांधते और पीठ पर झूल ओढ़ाते l नीचे पैरा डाल कर साफ़ दरी या गलीचा बिछाते फिर हम सारे बच्चे बुआ, दीदी और बाबा सवार होते रब्बा पर l वैसे तो रामलाल काका या खिन्नी काका ही रब्बा हांकते थे पर ऐसे कई मेलों पर मैं भी सारथी की तरह इस्तेमाल हुआ हूँ l महीनों पहले से मेले के लिए पैसे इकट्ठे किये जाते l मेले से लौटते हुए हमारे हाथों में हामिद का चिमटा नहीं वही मिट्टी के खिलौने ही होते l ग्वालिन, भिश्ती, गाय, बाँसुरी, डमरू, कड़कड़िया l बाबा जरूर घर गृहस्थी का सामान लाते l दुधहांडी, दही जमाने का मिट्टी का बर्तन, सिलबट्टा, मथानी, चलनी, झन्ना, सूप, मूसर, सिकहर ( झींका ) मुसक्का सब मेले से ही आते l छोटे बच्चों के लकड़ी के खिलौने मसलन चटुआ, और तीन पहिये की स्पेशल गाड़ी l ये तिपहिया पकड़ कर हमने भी चलना सीखा होगा, माँ - बाप को उंगली पकड़ कर बच्चे को चलवाने का वक्त कहाँ होता था तब l

अरे! मेले का विवरण तो रह ही गया l एक पुरानी सड़क के दोनों तरफ अनगिन दुकानें लाईन से सजी रहतीं l हम लोग अपना रब्बा पहले ही काफी दूर खड़ा करते l वहाँ भी खूब भीड़ रहती l अपने बैलों का तो पता रहता पर दूसरे बैल कितने मरकहे हैं यह कोई नहीं जानता l सो, बहुत संभल कर वहाँ से निकलने और आने की हिदायतें बार - बार दी जातीं l मेले में कतार से एक ही तरह की दुकानें एक जगह पर झाले माले की दुकानें देखते हुए हम लोग सबसे पहले खिलौनों पर जमा पूंजी खर्च करते l उसके बात चाट और फिर जलेबी l मेले में दो ही चीजें दिखाई पडतीं भीड़ और धूल l मेले में भीड़ जहां हर जगह चलती मिलती वहीं धूल हर जगह बैठी हुई दिखाई पड़ती l खिलौनों पर जलेबियों पर यहाँ तक कि भौहों - पलकों पर भी धूल आसन जमाये रहती l जलेबी और धूल खा कर कड़कड़िया और पिपिहरी बजाते हुए मुंह झप्पे अँधेरे तक घर लौट आते l मेला ख़तम - पैसा हजम l

बारात जाने का भी अपना आनंद होता l अमूमन तीन दिन की बारात होती l पिताजी बताते हैं पहले पांच दिनों की होती थी l रास्ते में बैलगाड़ी दौड़ होती कभी - कभी दुर्घटनाएं भी होतीं l पर ये तो हर खेल में होती हैं l गाँव के बाहर किसी बाग़ में बारातियों के ठहरने का जनवासा होता l सबसे पहला काम दौड़ कर मजबूत चारपाई पकड़ना होता था l एक आदमी चार - चार चारपाईयों पर कब्जा जमाता l एक पर झोला, एक पर अंगौछा, एक पर रूमाल और चौथे पर वह खुद विराजमान होता l मजाल कि कोई चारपाई हाथ से निकल जाय l दूल्हा जब पीनस में बैठ कर जनवासे तक आ जाता तब गोला दगाया जाता l तब जाकर जनाती शरबत पानी के इंतजाम में लगते l सबसे पहले मिर्चई / मिर्चवान पेश की जाती कुल्हड़ में l इतनी जहरीली होती कि आधा कुल्हड़ भी हम लोग न पी पाते उसे l फिर आती पंचमेल मिठाई l भैया फलाने ज़रा लघुशंका के लिए गए हैं उनका दोना और रख दो l ऐसा हर दूसरी चारपाई पर हो रहा होता l बाद में मिरचवान की जगह चाय चलने लगी l चाय तो लोग इस तरह पीते कि पूरा ड्रम चार चारपाईयों के लोग पी जाते l
अभी बारात बस जनवासे पहुंची है, अभी तो अगवानी भी नहीं हुई।

जारी है ....

PS :

मिर्चवान / मिर्चई - तीखा - मीठा शरबतनुमा पेय पदार्थ जिसे काफी मात्रा में काली मिर्च और बहुत कम मात्रा में चीनी को पानी में मिला कर बनाया जाता l आशय था कि यात्रा की थकान जाती रहे l हमसे थोड़ा पहले के जमाने में जिस दिन बारात पहुँचती थी उस दिन केवल दो गगरी मिर्चवान और कुल्हड़ हेड बाराती के पास रखवा दिया जाता था l चाहे तो पूरी बरात उसी में पिए या दो आदमी ही पी जाएँ l लड़की वाले और देने को बाध्य नहीं होते l

पीनस - डोली, जिस पर दूल्हा चढ़कर ब्याह करने जाता था l लौटे समय इस पर दुल्हन का कब्जा रहता l बारात दूर जानी हो तो कहार दूल्हे को पीनस पर बैठा कर एक दिन पहले ही निकल लेते l

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