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गांव का एक लड़का ( 3 )



स्कूल जाने वाले बच्चे इस लायक हो जाते कि खेती के कामों में हाथ बंटाया करते l करते क्या जबरदस्ती करवाया जाता l स्कूल से लौटते ही घर में काम तैयार बैठे रहते l स्कूल जाने से पहले गोबर - करकट सब बच्चों के जिम्मे ही होता l चचेरे भाई बहनों को मिलाकर हम नौ बच्चे थे l सबसे बड़ी दीदी और छोटी बहनें घर में माँ और चाची का हाँथ बंटाती l हम बाकी बच्चे बाबा का l

भाइयों में मैं दूसरे नंबर पर हूँ l मुझे और बड़े भईया की जोड़ी को ही बाहर के लगभग सारे काम करने पड़ते थे l काम के बंटवारे में अक्सर गोबर ही मेरे हाथ आता l जानवरों को चारा देना थोड़ा ज्यादा स्किल्ड काम था सो वह बड़े भाई के हिस्से में आता l दरवाजे पर झाडू लगाने के लिए हम अरहर के सूखे पौधे इस्तेमाल करते l जिन्हें ' झाँखर ' काहा जाता था l झाँखर का खरहंचा बना कर बड़ी आसानी से खड़े - खड़े झाडू लगा लेते l गर्मियों में कभी धूल ज्यादा होती तो पानी का छिडकाव कर खरहंचा मारते l गोबर हटाने का काम बाक़ी दिनों में तो आराम से हो जाता पर बारिश में यह काम बहुत तंग करता l एक हमारी बूढ़ी भैंस थी l वह इतना पतला गोबर करती ऊपर से बारिश, उफ़ l डलिया में नीचे पत्ते - वत्ते बिछाकर गोबर भरते पर सर पर रखकर जैसे ही चले सारा गोबर डलिया से बहकर चेहरा भिगोता हुआ पेट तक आ जाता l तब हम खाली लंगोटा बांध कर गोबर डालने जाते l

लंगोटे से याद आया, गुड़िया के त्यौहार वाले दिन गाँव में अखाड़ा खोदा जाता l हम सभी अपने - अपने गुईयाँ बदते, फिर जोड़ होता l मैं तो बेहद दुबला पतला था तो हमेशा हार जाता l लेकिन तैयारी जरूर करता l अम्मा सबके लंगोटे सिलतीं l हम लोग बाकायदा हफ्ते भर पहले से दंड बैठकी भी शुरू कर देते, दूध ज्यादा पीते l बारिश की मुलायम मिट्टी में खूब लोटते l फिर सारे गाँव के लोग ताल नहाने जाते l बरसात के दिनों में तालाब खूब भरा होता, पानी भी साफ रहता l फिर वहीं किनारे भीट पर बैठकर खूब कवित्त और गीत होते l सभी लोग कुछ न कुछ सुनाते हमारी भी कोई कविता होती l

खेती की पूरी जिम्मेदारी बाबा के कन्धों पर थी l पिताजी सुबह ड्यूटी जाने से पहले बाबा को ढेर सारे काम समझा जाते l पिताजी के सामने तो बाबा हाँ भैया - हाँ भैया कहते पर उनके जाते ही कहते," उनको क्या वह तो काम बता कर लाट साहेब जैसे चले गए हैं l हम मशीन हो जायँ क्या? हमसे बुढापे में अब कोई काम नहीं होता l" लेकिन सारा दिन खेतों में काम करते और शाम को पिताजी के आने के बाद पूरे दिन की एक - एक मिनट की दिनचर्या पिताजी को अपडेट करते l हम बच्चों की शिकायतें भी खूब करते कि भैया तुम्हारे लड़के कुछ कहा नहीं सुनते l कटी उंगली पर मूतने को कह दो तो कहते हैं अरे अभी तो हम मूत कर आए हैं हम कैसे मूत दें, उनसे कहो वो मूतें l जब खुश होते तो तारीफ़ भी करते l पर इन सबसे हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता l हम सब अपने हिसाब से कामचोरी करते रहते l

इतवार के दिन स्कूल की छुट्टी होती और होती कामों की लम्बी लिस्ट l सुबह जल्दी उठना फिर पूरा दिन काम l इतवार का दिन हमारे लिए छुट्टी नहीं सजा का दिन होता l जाड़ों में गेहूं के खेत में पानी लगाने के लिए अक्सर इतवार का दिन ही मुक़र्रर होता l हमारे पास खड़ी बॉडी का एक किर्लोस्कर इंजन था l छोटे - छोटे खेत चारों दिशाओं में फैले हुए l हरित क्रान्ति हो चुकी थी l हर खेत में ट्यूब वेल लगवाया गया l तब हाथ से बोरिंग होती हफ़्तों तक बोगी चलाई जाती l सारे खेतों में बोरिंग मेरे सामने ही हुई और उन सबमे हम बच्चों के श्रम का भी योगदान रहा l

मैं जब बहुत छोटा था तब गेंहूं पिताजी दस किलो की बोरी में शहर से लाया करते थे l लाल रँग का अमेरिकन गेहूं बिलकुल बेस्वाद सा था पर ज्वार - बाजरा खाते - खाते जी ऊब जाता l ऐसे में ये गेहूं की रोटिया भी पकवान से कम नहीं होतीं l हम लोग किसी मेहमान के आने पर उन्ही के साथ खाने के लिए प्राण देते l लालच वही गेहूं की रोटी l हमारे खेतों में ज्वार बाजरा मूंगफली अरहर और जौ ही उगाया जाता l पानी की किल्लत होने के कारण पैदावार बहुत कम होती l फिर आए उन्नत बीज, सिंचाई के उपकरण और हो गई हरित क्रान्ति l हमारे देखते - देखते खेतों में गेहूं की फसलें लहलहाने लगीं l बाजरे की काली मोटी रोटियों के दिन लद गए और आ गए पतली सफेद मुलायम चपातियों के दिन l

ढेर सारी चपातियाँ बनाकर कठौते में रख दी जातीं l कठौता भर रोटी बनाने में चाची नौ बजे रसोई में घुसतींऔर शाम चार बजे निकलतीं l गर्मियों में उनका चेहरा लाल भभूका हो जाता l अम्मा सुबह का नाश्ता संभालतीं l गाय भैंस भी अम्मा ही दुह्तीं l सुबह हम लोग दातून मंजन कर बासी रोटी में देसी घी, डालडा या सरसों का तेल लगा कर चाय के साथ नाश्ता करते l अम्मा तब तक पराठे बना देतीं और हम सब चार - चार पराठे नमक के साथ कपडे में बांध कर स्कूल ले जाते l लौट कर चार बजे कठौते में रोटियाँ हमारा इंतज़ार करतीं l रात में फिर वही चपातियां दूध के साथ हम सब गटक रहे होते l

जारी है ....

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