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गांव का एक लड़का ( 2 )


पुरानी पैंटों से बनाए गए झोलों में हिंदी भाषा और अंकगणित की दो किताबें, सूखी खड़िया के कुछ छोटे टुकड़े, कुछ बड़े कंचड़े, सेंठा और नरकुल की छोटी बड़ी कई कलमें, एक पतली बोरी या टाट का टुकड़ा अधिकृत सामग्रियाँ थीं l अनाधिकृत सामग्री जैसे कंचे, लट् टू, पीले कनेर के बीजों की गोटियाँ, रंगीन ऊन के डोरे, ब्रेड का चिकना रैपर, साइकिल ट्यूब को काट काट कर बनाई हुई गेंद, प्लास्टिक के सस्ते खिलौने और बहुत सारी अनर्गल चीजें भी उसी सहजता से झोले में एक साथ रहतीं l

कक्षा तीन और उससे सीनियर बच्चों के झोलों में एक किताब और बढ़ जाती ' विज्ञान आओ करके सीखें ' l पाटी कि जगह कुछ चौसठ पेजी कॉपियां होतीं l कलम के बारे में थोड़ा और बात कर ली जाय l सेंठा हमारे गांव में बहुतायत में था l कहीं नहीं दिखा तो छप्पर से निकाल कर झट से कलम तैयार l बनाने में आसानी और उपलब्धता के चलते सबके झोलों में इसी की कलमें होतीं l स्कूल में कुछ बच्चों के पास नरकुल की कलमें होतीं जिन्हें पाने के लिए हम लालायित रहते l वस्तु विनिमय से या कोई विशेष काम किये जाने पर या दोस्ती को प्रगाढ़ करने के लिए वह कलमें हमारे पास भी आ जातीं l नहीं तो आख़िरी सर्वमान्य तरीका चोरी वाला तो था ही l बस इसमें यही एक समस्या थी कि उसे छुपा कर घर में ही रखना पड़ता l अगली पार्टी के शंकित होने पर कभी भी आपके झोले का झारा लिया जा सकता था l

लकड़ी की एक मजबूत पाटी जिसे शाम को ही कालिख पोत कर और घोटा लगाकर तैय्यार कर लिया जाता l बढ़िया कालिख ढिबरी वाले आले से, लालटेन के शीशे से या तवे से मिलती जाती l कभी - कभी अम्मा काजल पारने वाली पुरानी बड़ी दीया में कालिख इकट्ठा कर देतीं l पाटी में पकड़ने के लिए एक मुठिया होती, जो जरूरत पड़ने पर पाटी को तलवार की तरह भांजने में मदद करती l मोटे काँच, चौंड़े पेंदे और चौंड़े मुँह वाली दवात, जो घोटा लगाने के भी काम आती थी, झोले से बाहर हाँथ में ही रहती l सर में सरसों का तेल और माथे पर काजल का टीका लगा कर 6 से 12 साल के लड़के छोटी छोटी टोलियों में निकल पड़ते l अधिकतर नंगे पैर या हवाई चप्पल पहने मेड़ों पर लाईन बनाते हुए तेज आवाज में बतियाते बच्चे, इस बात की चिंता बिल्कुल नहीं करते कि मरकहे पंडित जी ने बेशरम के पाँच डंडे आज के लिए कल ही मँगवा लिए थे l

स्कूल में मैं एक पढ़ाकू लड़के के रूप में जाना जाता था l इस प्रभाव की रक्षा के लिए मुझे पढ़ना भी पढता l धीरे - धीरे शाबाशी पाने का शौक लग गया और मैं अपने आप को होशियार समझने लगा l इतना होशियार कि एक बार शायद कक्षा चार में मैंने किसी प्रश्न का उत्तर लिखते हुए यूरोप लिखा l पुस्तक में योरप लिखा हुआ था l मुंशी जी ने पूछा कि तुमने यूरोप क्यों लिखा तो मैंने कहा कि " मेरी सोच से ' यूरोप ' ही सही शब्द है ' योरप ' नहीं, किताब में गलत छपा हो सकता है l" हालाँकि अपने इम्प्रेशन के कारण मार खाने से तो बच गया पर सारे उत्तर दुबारा से लिखने पड़े l स्कूल में कवितायें पढने के लिए सबसे पहले हमीं खड़े होते और किसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए भी l आत्मविश्वास के मामले में मेरा यह स्वर्णिम काल था l आगे चलकर यह धीरे - धीरे गोबर काल में परिवर्तित हो गया l

स्कूल के रास्ते में करीब सौ मीटर की लम्बाई में बालू का एक गलियारा पड़ता था. जिसे गर्मियों में बगैर पेंड़ के नीचे रुके हुए पार करना एवरेस्ट पार करने जैसा था l किसी तेज धूप वाले दिन जो भी उसे इस तरह पार करता था, वह उस दिन का हीरो होता था. उस नंगे पैर भागना ज्यादा आसान होता, सो हवाई चप्पल हाथ में पकड़ कर दौड़ होती l एक और चुनौतीपूर्ण कार्य रास्ते में होता l नन्हू बाबा की अमरुदही बगिया से अमरुद तोड़ना. इसके लिए दो टोलियाँ बनती थीं. एक दिलेर लड़कों की जो अमरुद तोड़ते और दूसरी डरपोंक लड़कों की l मैं अक्सर दूसरी टोली में ही रहता था. लड़कियों को दोनों टोलियों में नहीं रखा जाता था. दूसरी टोली का काम था नन्हू बाबा को बारी बारी सलाम करना और उनकी बकरी के बच्चों के हालचाल लेना. बच्चे हों तो गोद में उठा कर उन्हें खिलाना. हम लोग उन्हें बातों में उलझा कर अपने आप को तीसमार खां समझते रहे उन दिनों l बाग़ के लगभग बीचोबीच ललगुदिया अमरूद का पेंड़ था l उसका अमरुद तो लाने वाला हमारी नजरों में हीरो होता l यह तो बहुत बाद में पता चला कि उन्हें मालूम था कि कितनी देर बाद उनको पीछे जाना होता था जहाँ चोरी हो रही होती l आहट सुनकर पहली टोली भाग लेती l बरसों बरस बाद यह बात नन्हू बाबा ने खुद बताई l

वैसे तो हमारा गाँव शहर से मात्र पच्चीस किलोमीटर ही दूर था l अभी तो खैर शहर खरामा - खरामा चलता हुआ गांव में जबरन घुस आया है l लेकिन उस समय तो अपने स्थापत्य कला में सुदूर बस्तर जिले के गावों को टक्कर देता था l एक छोटे से जंगल के बीचोबीच बसा हुआ एक छोटा सा ठेठ गाँव l बिजली का तो खैर नामोनिशान तक नहीं था. गाँव तक पहुँचने के लिए एक बालू भरा गलियारा था, जिस पर आप साईकिल चलाते हुए तो नहीं ही जा सकते थे. उस पूरे गलियारे में खाली साईकिल घसीटना एक बहुत थकाऊ और पकाऊ काम होता l जब कभी किसी की शादी ब्याह में गलती से कार या जीप आ जाती तो उसे धक्के मारकर ही पार कराना पड़ता था l आज तो शहर ने लगभग निगल ही लिया है गाँव को l शहर उस समय मेरे लिए विदेश जैसा था l कभी कभार शहर जाने का मौक़ा जब मिलता, तो जाने से पहली वाली रात को अत्यधिक उत्साह के कारण नींद नहीं आती थी. पिताजी पोस्ट ऑफिस में नौकरी करते थे और रोज साइकिल और ट्रेन से शहर आते जाते थे, लेकिन हम बच्चों की पूरी दुनिया बस गाँव तक ही सीमित थी l

जारी है ....

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