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धीरज

          रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे l ओपीडी समाप्त कर वार्ड में आज का आख़िरी राउंड भी बस अभी ख़त्म हुआ था l डॉ धीरज घर जाने ही वाले थे कि चैंबर का दरवाजा खोलते हुए स्टाफ़ ने हिचकिचाते हुए कहा " सर, एक बच्चा है l तो भेजो ना उसे, डॉ का अंदाज़ थोड़ा तल्खी भरा था l डॉ धीरज की तल्खी इसलिए थी कि मरीज दिखाने से पहले पूछने की क्या जरूरत? सबको पता है कि डॉ साहब अगर हॉस्पिटल में हैं तो मरीज देखना ही है l " सर, उसके पास पैसे नहीं है और मरीज गंभीर है शायद भरती की जरूरत पड़े l " वाक्य का आख़िरी हिस्सा उसने जल्दी से जोड़ा कि कहीं फिर डांट न पड़ जाए l क्योंकि नियम यह भी था कि मरीज के पास अगर पैसे नहीं भी हैं तो भी उसे ओपीडी में दिखाने से इनकार नहीं कर सकते l
        चार महीने की बच्ची माँ की गोद में निढाल हो गई थी l आँखें गड्ढे में घुसी हुई गाल पिचके हुए l एक बारगी तो डॉ को ऐसा लगा जैसे उसमे प्राण नहीं है l बहुत बार ऐसे ही लोग मरे हुए बच्चे को लपेट कर अस्पताल पहुँचते हैं l बच्चे में हरकत देखकर डॉ धीरज बच्चा माँ के हाथ से लगभग छीनते हुए इमरजेंसी की तरफ लपके l बड़ी मुश्किल से आईवी लाइन लग पाई l ऑक्सीजन और फ्लूड बोलस शुरू किया गया l
       बच्चे को माँ की गोद में देते हुए बीमारी के बारे में पूछताछ शुरू हुई l पता चला कि बच्चा पिछले चार दिनों से बीमार है l एक बोतल पानी में एक चम्मच अमूल मिल्क पाउडर दिया जा रहा था बच्ची को l चार महीने में उसका वजन तीन किलो भी नहीं हो पाया था l उसे दस्त हो रहे हैं, तेज बुखार है और खांसी आ रही है l बच्चे का पिता रिक्शा चलाता है l गरीबी तो खैर उनके कपड़ों से ही फूट पड़ रही थी l करीब बीस एक साल की माँ अभी कुछ दिनों पहले ही गाँव से यहाँ रहने आई है l यह उसका पहला ही बच्चा है l
      डॉ धीरज ने उसे समझाना शुरू किया " देखिये, आप का बच्चा बहुत गंभीर है, इसे बहुत ज्यादा इन्फेक्शन है, निमोनिया भी है और जान का गंभीर ख़तरा है l अभी थोड़ा ग्लूकोस चढ़ा दिया है जिससे पानी की कमी में थोड़ी राहत है l हालत अभी भी बहुत चिंताजनक है l इलाज के दौरान जान जाने की आशंका है l आप इसे अभी पास के सरकारी अस्पताल में ले जाइए l गरीब आदमी हैं प्राइवेट अस्पताल का खर्च नहीं उठा पायेंगे l "
         " तुम इलाज सुरू करौ, पइसा की चिंता ना करव l " पिता की लड़खड़ाती आवाज में थोड़ा रौब भी झलक रहा था l लाल आँखें लिए लहराते हुए उस रिक्शा खींचने वाले के अन्दर इस समय दारू सवार थी l डॉ धीरज उसे बाहर का रास्ता दिखा रहे थे पर वह जाने को तैयार नहीं था l अभी वह डॉ के पैर पकडे जमीन पर बैठा हुआ दीन हीन लग रहा था l डॉ धीरज को पता है कि देर रात में गंभीर बीमार बच्चे के दारू से धुत बाप को किसी भी कीमत पर अस्पताल में भरती नहीं करना है l इसी बीच डॉ धीरज की पत्नी डॉ मधु भी इमरजेंसी में आ चुकी थीं l वैसे तो वह डॉ धीरज पर गुस्सा होने आई थीं कि दो बार खाना गर्म होकर ठंडा हो चुका है l पर यहाँ तो हालात ही दूसरे थे l पिछले आधे घंटे से वह भी बच्ची पर लगी हुई थीं l बच्ची की माँ के आँसू लगातार बहते जा रहे थे l डॉ मधु ने भी डॉ धीरज से रिक्वेस्ट की " अरे! कहाँ ले जायेगा बेचारा रात में, भरती कर लीजिये l जो होगा देखा जाएगा l "
       " ठीक है भरती करो इन्हें " डॉ ने सिस्टर से कहा l " और हाँ, लिखवा लेना कि मेरा बच्चा बहुत गंभीर है l इलाज के दौरान जान भी जा सकती है l मुझे सरकारी अस्पताल भेजा जा रहा है पर मैं अपने बच्चे का इलाज यहीं कराना चाहता हूँ l मुझे यहाँ की सुविधाओं और खर्चे के बारे में बता दिया गया है l " डॉ धीरज रटे हुए वाक्यों को तेजी से बोलते हुए बच्ची को फिर से इक्जामिन करने लगे l
       अभी डॉ धीरज मरीज की केस शीट भर ही रहे थे कि रिसेप्शन से फोन आया " सर, ये कह रहे हैं कि इनके पास एक पैसा भी नहीं है जमा करने को, क्या करें?" " अरे, कुछ तो जमा करवा लो कम से कम दवाओं के लिए तो करा ही लो " डॉ ने शांत लहजे में कहा l तब तक बच्ची का बाप हाथ जोड़े चैंबर में चला आया l " साहेब, हमरी बिटिया क बचा लेव हम सुबेरे पइसा जमा कई देबे l" " ठीक है, कल सुबह कुछ जमा कर देना कुछ हम छोड़ देंगे, तुम्हारा काम हो जाएगा l " डॉ ने उसकी तरफ देखते हुए कहा l
         बेडरूम में घुसते - घुसते रात के ढाई बज रहे थे l डॉ धीरज बुरी तरह थक गए थे और एक ग्लास ठंडा दूध पीकर सोने की कोशिश करने लगे l इण्टरकॉम की आधी घंटी पर ही फोन उठाया तो पता चला कि इमरजेंसी बेड नं. दो के बच्चे को झटके आ रहे हैं l स्लिपर पहन कर एक मिनट में डॉ धीरज बेड साइड पहुँच चुके थे l भोर के सवा चार बजे थे, बाक़ी घर के लोग और अस्पताल के मरीज गहरी नींद में थे l बच्ची के पिता को बुलवाया तो पता चला वह काफी देर पहले यहाँ से जा चुका है l स्टाफ़ ने ही बच्चे की माँ को चाय पिलाई थी l बच्ची गंभीर होती चली गई, बहुत कोशिश के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका l सुबह के छ: बजने वाले थे, बस थोड़ी देर पहले ही उसका पिता अवतरित हुआ था l शराब की बदबू अभी भी उसके मुंह से आ रही थी शायद यहाँ से जाने के बाद उसने फिर पी थी l डॉ ने उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसने डॉ का हाथ तेजी से झटक दिया l डॉ धीरज चुपचाप अपने चैंबर में आकर डेथ सर्टिफिकेट बनाने लगे l
       बाहर बड़ी तेज कांच टूटने की आवाज आई l बच्ची का पिता दरवाजे पर लात मारकर जोर - जोर से गालियाँ बकता हुआ अस्पताल से जा रहा था l " हम जब लाये रहन तब बिलकुल ठीक रहै बिटिया, घर मा दूधू पीयेसि रहै l पता नहीं कउन इंजेक्सन लगाय कै मारि दिहिस डाक्टरु l हम कहा कि पइसा हम सुबेरे द्याबै मुलु इनका सबूरी न भै l जल्लाद आय सार l "
       डॉ धीरज का धीरज खो चुका था l वह दांत भींच कर तेजी से आगे बढ़े l तभी पीछे से शोर सुनकर दौड़ी आई डॉ मधु ने उन्हें रोक लिया l " कोई नहीं उसका बच्चा मर गया है, दुखी है बेचारा, जाने दीजिये l आप तो खुद धीरज हैं थोड़ा धीरज रखिये l " अभी डॉ धीरज का बढ़ा हुआ बीपी कम भी नहीं हो पाया था कि सिस्टर ने चैंबर में झाँक कर कहा " सर एक बच्चा है इमरजेंसी में. काफी सीरियस है l "
     डॉ धीरज ने डॉ मधु को एक क्षण के लिए देखा और आला उठाकर तेजी से इमरजेंसी की तरफ भाग चले l
- प्रदीप शुक्ल

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